मनोज पाल (9911711593)
एक पुरानी कहावत प्रचलित है कि अगर बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी हो तो उन्हें पढ़ाई के लिए गांव से शहर भेजना पड़ता है। मगर क्या आपने यह कहावत भी सुनी है कि अब शहर के बच्चे भी अच्छी शिक्षा के लिए गांव का रुख करते हैं? बात भले ही अटपटी लगे, लेकिन यह सौ फ़ीसदी सच है। मुजफ्फरनगर जनपद के जडौदा गांव में होली चाइल्ड पब्लिक इंटर कॉलेज की स्थापना कर प्रवेंद्र दहिया ने इस कहावत को बदलकर रख दिया है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अब बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए शहर नहीं जाना पड़ेगा, बल्कि गांव में भी वैसी ही शिक्षा मिल सकती है, जिसकी रोशनी से उनके भविष्य का आसमान जगमगा उठे।

साल 1980 के फरवरी माह की 25 तारीख, जडौदा गांव के एक साधारण किसान परिवार में प्रवेंद्र दहिया का जन्म हुआ। चौधरी कृषिपाल सिंह के घर पहली संतान थी । पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। साधारण जीवन की सीमाओं में जन्म लेने वाला यह बालक अपनी सरलता और जिज्ञासा के कारण किसी ने साधारण नहीं माना। बचपन से ही प्रवेंद्र दहिया में ज्ञान की प्यास, सीखने की लगन और सीखने के प्रति समर्पण देखने को मिला। वह किताबों के पन्नों में सिर्फ अक्षर नहीं पढ़ते थे, बल्कि भविष्य की तस्वीर उकेरते थे। उनके माता-पिता ने भी उनकी इस लगन को समझा और हर संभव साधन उपलब्ध कराने की कोशिश की।
प्रवेंद्र दहिया ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुजफ्फरनगर शहर से पूरी की। चौधरी छोटूराम इंटर कॉलेज से 10वीं और 12वीं की पढ़ाई उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने चौधरी छोटूराम कृषि महाविद्यालय से बीएससी और एमएससी की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद श्रीराम कॉलेज से बीएड की उपाधि हासिल की। अपनी पढ़ाई के दौरान उन्हें यह अनुभव हुआ कि ग्रामीण बच्चों के लिए शहर आकर पढ़ाई करना कितना कठिन है। रोज़ाना लंबी दूरी तय करना, समय की बर्बादी और वातावरण की असुविधाओं ने उनके अंदर शिक्षा के प्रति गहरा जज़्बा पैदा किया।

12वीं के बाद प्रवेंद्र ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि कितने बच्चे योग्य संसाधनों और मार्गदर्शन के अभाव में अपने सपनों से दूर हैं। वर्ष 2003 में उन्होंने मार्केटिंग रिप्रेजेंटेटिव की नौकरी शुरू की, लेकिन चार महीने के भीतर ही उनका मन ऊब गया। नौकरी करते समय उन्हें बार-बार यह अहसास होता रहा कि शिक्षा उनके जीवन की सच्ची दिशा है। अंततः वर्ष 2004 में उन्होंने साहसिक निर्णय लिया और नौकरी छोड़कर शिक्षा के क्षेत्र में अपने योगदान को समर्पित कर दिया।

15 जून 2004 को जडौदा गांव में नर्सरी से लेकर कक्षा 5 तक के बच्चों के लिए होली चाइल्ड पब्लिक स्कूल की नींव रखी गई। शुरुआत में बच्चे टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ते थे। लेकिन प्रवेंद्र दहिया ने ठान लिया था कि गांव का बच्चा कभी हीनभावना का शिकार नहीं होगा। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में पहली बार आधुनिक फर्नीचर, शैक्षणिक संसाधन और अनुशासित वातावरण उपलब्ध कराया। यह बीज भविष्य में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति बनकर उभरा। समय के साथ होली चाइल्ड पब्लिक इंटर कॉलेज 12 तक हो गया और केवल क्लासरूम तक सीमित नहीं रहा बल्कि डिजिटल क्लास, रोबोटिक्स, मार्शल आर्ट, संगीत, खेल-कूद और अतिरिक्त गतिविधियों को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा भी बन गया। प्रवेंद्र दहिया का मानना है कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों को जीवन की वास्तविक चुनौतियों से जूझना सीखना चाहिए। इसलिए विद्यालय में मानसिक स्वास्थ्य, करियर काउंसलिंग, व्यक्तित्व विकास और समय-समय पर विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।

प्रवेंद्र दहिया का मानवीय पक्ष भी उतना ही प्रखर है। कोरोना महामारी के दौरान, जब अभिभावक आर्थिक संकट से जूझ रहे थे, तब उन्होंने विद्यालय की फीस 50% तक कम कर दी। जिन परिवारों से आधी फीस भी नहीं ली जा सकी, उनसे कभी कोई मांग नहीं की गई। यह केवल एक प्रबंधक का निर्णय नहीं था, बल्कि एक संवेदनशील गुरु का हृदय था। जिन बच्चों के घर में कमाने वाला व्यक्ति नहीं होता या परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होता है, उन बच्चों को प्रवेन्द्र दहिया अपने स्कूल में फ्री शिक्षा उपलब्ध कराते है, जो अपने आप में मिशाल है | प्रवेंद्र दहिया की दूरदृष्टि और शिक्षा के प्रति उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में मानद उपाधि से भी नवाजा गया। यह सम्मान केवल उनके लिए नहीं, बल्कि उन तमाम ग्रामीण बच्चों के लिए गर्व का प्रतीक है जिन्हें उन्होंने अपने विद्यालय के माध्यम से शिक्षा का उज्जवल मार्ग दिखाया।

उनकी सफलता के पीछे उनकी पत्नी रीटा दहिया का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यालय के प्रबंधन, बच्चों के अनुशासन और संस्थागत कार्यों में उनका सहयोग हर मोड़ पर प्रवेंद्र के साथ रहा है। यही कारण है कि उनकी सफलता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि परिवार और समाज के सहयोग का परिणाम भी है।
प्रवेंद्र दहिया का योगदान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। उन्होंने ‘मेरा वजूद फाउंडेशन’ नामक एनजीओ की स्थापना की, जो मानसिक स्वास्थ्य, नैतिक मूल्यों और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में निरंतर कार्यरत है। इसके अलावा, उन्होंने ‘इनसाइट टॉक’ नामक कार्यक्रम की भी शुरुआत की, जिसमें समाज के प्रेरक व्यक्तित्व बच्चों को जीवन की दिशा और ऊर्जा देने के लिए बुलाए जाते हैं। यह कार्यक्रम हमेशा निशुल्क होता है और बच्चों के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2011 में जब स्मार्ट क्लास जैसी तकनीकी सुविधा ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग सपना ही थी, तब प्रवेंद्र दहिया ने एडुकॉम कंपनी के सहयोग से अपने विद्यालय में पहली स्मार्ट क्लास स्थापित की। उनका मानना है कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बच्चों को तकनीकी और आधुनिक ज्ञान के साथ-साथ नैतिक और सामाजिक मूल्यों से भी परिचित कराना चाहिए। आज होली चाइल्ड पब्लिक इंटर कॉलेज केवल एक विद्यालय नहीं है, बल्कि एक आंदोलन बन चुका है। यहां से पढ़कर निकले छात्र आईटी, प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस विभाग, विज्ञान, व्यापार और अन्य क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ रहे हैं। उनके प्रयास यह साबित करते हैं कि शिक्षा के लिए अब शहर नहीं, बल्कि गांव भी पर्याप्त है।

प्रवेंद्र दहिया का सपना यहीं समाप्त नहीं होता। भविष्य में वे एक ऐसे गुरुकुल की स्थापना करना चाहते हैं, जहां आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय परंपरा, संस्कार और नैतिक मूल्यों का भी गहन अध्ययन कराया जाएगा। उनका मानना है कि इसी संतुलित दृष्टिकोण से भारत विश्व में शिक्षा और विकास के क्षेत्र में नया आयाम स्थापित कर सकता है।
उनकी कहानी आज हर उस युवा और शिक्षक के लिए प्रेरणा बन चुकी है, जो यह मानते हैं कि साधारण जीवन परिस्थितियों से भी असाधारण परिणाम निकाले जा सकते हैं। प्रवेंद्र दहिया ने यह सिद्ध कर दिया कि शिक्षा का वास्तविक मंदिर वह है जहां शिक्षक का समर्पण और दृष्टिकोण शुद्ध हो।

पुरानी कहावत बदल चुकी है। अब बच्चों को शिक्षा के लिए शहर जाने की आवश्यकता नहीं है। अब शहर के बच्चे भी गांव की ओर रुख कर सकते हैं। यही प्रवेंद्र दहिया का असली विजयपथ और उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश है।
