मुज़फ्फरनगर। समाज की भीड़ में कभी-कभी एक ऐसा व्यक्तित्व उभरकर सामने आता है, जो अपने कर्म और चरित्र से राह बनाता है और दूसरों के लिए मशाल थाम लेता है। सुनील पाल भी उन्हीं में से एक हैं,एक ऐसा युवा चेहरा, जिसने शिक्षा, संघर्ष और सेवा की तिहरी कसौटी पर खुद को परखा और आज पाल समाज में नई उम्मीद का प्रतीक बनकर खड़ा है।

आदर्श कॉलोनी का यह साधारण युवक असाधारण संकल्प का धनी है। उनके पिता स्वर्गीय दयाचंद पाल मेरठ जिले के खिवाई गाँव से थे और कोऑपरेटिव बैंक में लम्बी सेवा देने के बाद ईमानदारी की छाप छोड़ गए। पिता के संस्कारों और संघर्षपूर्ण जीवन ने ही सुनील के भीतर धैर्य और अनुशासन की वह ज्वाला प्रज्वलित की, जिसने उन्हें शिक्षा को जीवन का शस्त्र मानने पर विवश कर दिया। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा से लेकर पॉलिटिकल साइंस में स्नातकोत्तर और फिर एलएलबी तक की शिक्षा पूरी करना, केवल डिग्रियाँ पाना नहीं था—बल्कि अपनी सोच और दृष्टि को पैना करना था।

फरीदाबाद में असिस्टेंट मैनेजर के रूप में एक सुरक्षित नौकरी उनके जीवन को सहज बना सकती थी, परंतु नियति ने कुछ और ही लिखा था। वर्ष 2021 में पिता का निधन उनके जीवन में एक भूचाल की तरह आया। वही क्षण था जब उन्होंने रोज़गार के मोह को त्यागकर समाज सेवा की कठिन परंतु सार्थक राह चुन ली। नौकरी का पद त्यागकर उन्होंने लोगों के बीच जाकर उनकी तकलीफ़ों को अपना ध्येय बना लिया।इस संकल्प यात्रा में उनकी जीवन संगिनी रीतू पाल का साथ सबसे बड़ी ताक़त बनकर आया, जो लघु सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर हैं। परिवार से मिली यह मजबूती ही उनके लिए पंख बनी, जिनसे वे समाजहित की ऊँचाइयाँ नापने लगे।

सुनील का सामाजिक जीवन वास्तव में 2019 के धनगर जाति प्रमाणपत्र आंदोलन से शुरू हुआ। उस आंदोलन ने उन्हें भीड़ से अलग एक नेतृत्वकारी स्वर प्रदान किया। धीरे-धीरे उन्होंने संगठन की जिम्मेदारियाँ संभालीं और आज वे अखिल भारतीय पाल महासभा के नगर अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं। हाल ही में मीरापुर विधानसभा उपचुनाव में पाल समाज के राजनीतिक अधिकारों को लेकर उन्होंने मुखर होकर आवाज़ बुलंद की। उनकी दृष्टि साफ है,जब तक समाज आंतरिक खींचतान से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक राजनीति में उसका वजूद सशक्त नहीं होगा।उनका मानना है कि शिक्षा ही भविष्य की असली पूँजी है।

वे निरंतर युवाओं को प्रेरित करते हैं कि किताबों और ज्ञान को हथियार बनाकर ही समाज की पहचान बदली जा सकती है। उनके शब्दों में दृढ़ता और कर्मों में निरंतरता ने युवाओं को नई ऊर्जा दी है।मुज़फ्फरनगर का यह युवा चेहरा अब केवल एक कॉलोनी या मोहल्ले तक सीमित नहीं रहा। उनकी सोच का विस्तार इतना व्यापक है कि वह न सिर्फ अपने समाज के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा-सूचक बन चुका है। सुनील पाल यह साबित कर रहे हैं कि असली नेतृत्व वही है जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज के भविष्य को उज्जवल बनाने का संकल्प ले।उनकी गाथा हमें यह सिखाती है कि हिम्मत, शिक्षा और समाजहित की आंच से तपकर ही एक इंसान समाज का दीपक बन सकता है,और सुनील पाल निस्संदेह उसी रोशनी के वाहक हैं।

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