सत्र की शुरुआत डॉ. प्रतिभा त्रिपाठी के संबोधन से हुई। उन्होंने तीन दिवसीय विमर्श की प्रमुख चर्चाओं का सार प्रस्तुत करते हुए इसे “युवा विचारों के संवाद और राष्ट्र निर्माण की भावना का प्रतीक” करार दिया।

मुख्य वक्ता ऑर्गनाइज़र संपादक प्रफुल्ल केतकर ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद को भारतीय संवैधानिक ढांचे के लिए गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा संविधान, राष्ट्र और लोकतंत्र—तीनों का विरोध करती है। जहां जहां मार्क्सवाद फैला, वहाँ लोकतंत्र का गला घोंटा गया।

केतकर ने संविधान से जुड़ी दो प्रमुख मिथ्याओं को खारिज किया: यह केवल ब्रिटिश मॉडल की नकल है।यह किसी एक समुदाय के हितों के लिए बनाया गया।

डॉ. भीमराव अंबेडकर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत लोकतंत्र से अनजान नहीं था; हम संसद और उसकी प्रक्रियाओं को भलीभांति जानते थे। अंबेडकर ने कम्युनिस्ट और समाजवादी दलों को संविधान का प्रमुख आलोचक बताया था।

केतकर ने जोर दिया कि ये विचारधाराएँ भारत-केंद्रित नहीं, बल्कि चीन-केंद्रित हैं और देश को जाति, भाषा, समुदाय व क्षेत्र के आधार पर बाँटने का प्रयास करती हैं। उन्होंने उद्घोष किया कि भारत के संस्कृति की रक्षा करना ही भारत के संविधान का रक्षा करना है।

मुख्य अतिथि यूजीसी के सचिव प्रो. मनीष आर. जोशी ने भारतीय संविधान और सभ्यतागत मूल्यों के गहरे संबंध पर प्रकाश डाला। “वंदे मातरम्” के 150 वर्ष पूरे होने पर बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि यह गीत मात्र रचना नहीं, भारत माता से भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है। संविधान की प्रस्तावना के तीन सिद्धांतों—स्वतंत्रता, समानता और बंधुता को उन्होंने सनातन परंपराओं से जोड़ा: स्वतंत्रता और समानता: “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”

बंधुता: “वसुधैव कुटुम्बकम्”। उन्होंने युवाओं से हीन भावना त्यागने और भारतीय धरोहर अपनाने का आग्रह किया।

विशिष्ट अतिथि कमला नेहरू कॉलेज प्राचार्या प्रो. (डॉ.) पवित्रा भारद्वाज ने आयोजन को “विचारों का उत्सव” बताया। उन्होंने कहा, “युवा ज्ञान प्रसार के साथ-साथ युवाओं को समाज में सकारात्मक परिवर्तन का ‘परिवर्तनकारी एजेंट’ बनाने का कार्य कर रहा है।” सत्र की बड़ी उपलब्धि रही युवा की नई वेबसाइट का शुभारंभ, जो संगठन के डिजिटल विस्तार और युवा-नेतृत्व वाले राष्ट्र निर्माण को गति देगी।

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