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नई दिल्ली, 09 जनवरी । दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने आज विशेषाधिकार समिति के प्रथम प्रतिवेदन के संबंध में सदन में वक्तव्य देते हुए कहा कि समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के बाद सामने आई वस्तुस्थिति को सदन के सामने रखा गया है। उन्होंने बताया कि यह मामला न केवल एक बड़े ऐतिहासिक दावे से संबंधित है, बल्कि इस विधानमंडल और इसकी समितियों के अधिकार, गरिमा और कामकाज से भी जुड़ा हुआ है।

अध्यक्ष ने बताया कि फरवरी 2025 में आठवीं विधान सभा के गठन के बाद दिल्ली विधानसभा भवन के ऐतिहासिक स्वरूप को संरक्षित और सुरक्षित रखने के लिए कई पहल की गईं। इस प्रक्रिया के दौरान ऐतिहासिक सटीकता और विश्वसनीयता बनाने के उद्देश्य से, आधिकारिक रिकॉर्ड और अभिलेखीय सामग्री की जांच की गई। राष्ट्रीय अभिलेखागार से मिली जानकारी से यह सामने आया कि विधानसभा परिसर के भीतर “फांसी घर” का कोई अस्तित्व नहीं है। इसकी बजाय, रिकॉर्ड बताते हैं कि संबंधित स्थान का उपयोग “टिफिन रूम” के रूप में किया जाता था।

अध्यक्ष ने कहा कि मैंने 05 अगस्त 2025 को सदन को इन तथ्यों से अवगत कराया था। इस मामले पर तीन दिनों तक सदन में विस्तार से चर्चा हुई, जिसमें मुख्यमंत्री, मंत्रियों और अनेक सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किए। सदन की भावना को ध्यान में रखते हुए और स्थापित संसदीय प्रथा के अनुसार, मामले को विस्तृत और निष्पक्ष जांच के लिए विशेषाधिकार समिति को भेजा गया।

समिति ने नियमनुसार संबंधित व्यक्तियों से लिखित टिप्पणियां मांगने के लिए नोटिस जारी किए और उसके बाद इस मामले की तथ्यात्मक स्थिति का पता लगाने में सहायता के लिए उनको अपने समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए बुलाया। पर्याप्त अवसर, समय और स्पष्टीकरण दिए जाने के बावजूद और न्यायालय से किसी भी रोक, आदेश या निर्देश न होने के बाद भी संबंधित चार व्यक्तियों, (तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, तत्कालीन विधान सभा अध्यक्ष राम निवास गोयल, तत्कालीन उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और तत्कालीन विधान सभा उपाध्यक्ष राखी बिड़लान) में से कोई भी निर्धारित तारीखों पर समिति के सामने पेश नहीं हुआ।

अध्यक्ष ने कहा कि मैंने स्वयं भी विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट का अध्ययन किया है और यह पाया है कि समिति ने घटनाओं के क्रम, किए गए पत्राचार, कानूनी स्थिति, विभिन्न संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों और स्थापित संसदीय प्रक्रिया और उदाहरणों की सावधानीपूर्वक जांच की है। समिति के मतानुसार संबंधित व्यक्ति समिति की बैठकों से जानबूझकर और अपनी मर्जी से अनुपस्थित रहे और उन्होंने बिना किसी उचित कारण के समिति के कार्य को बाधित किया है। समिति के मतानुसार, ऐसा आचरण सदन और समिति की अवमानना के बराबर है।

सदस्य ध्यान दें कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991 की धारा 18 (3) और कार्य संचालन नियमों के तहत इस सदन और इसकी समितियों को लोकसभा और उसकी समितियों के बराबर शक्तियां, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां प्राप्त हैं। व्यक्तियों को बुलाने और उनसे सबूत मांगने का विधायी समितियों का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी बरकरार रखा गया है। विशेषाधिकार समिति ने सिफारिश की है कि समिति की बैठकों से जानबूझकर अनुपस्थिति के लिए संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ सदन उचित कार्रवाई कर सकता है।

अध्यक्ष ने बताया कि यह सदन हमेशा संवैधानिक औचित्य, आपसी सम्मान और संस्था की गरिमा को ध्यान में रखकर कार्य करता रहा है। विधायिका और इसकी समितियों का अधिकार हमारे लोकतांत्रिक ढांचे का अभिन्न अंग है। यह सही है कि संबंधित व्यक्तियों और संस्थानों को कानूनी उपायों का लाभ उठाने का पूरा अधिकार है लेकिन ऐसे उपायों का उपयोग इस सदन की कार्यवाही की अवहेलना या उसे कमजोर करने के बहाने के रूप में नहीं किया जा सकता है।

अध्यक्ष ने कहा कि मैं इस मामले को पूरे भरोसे के साथ सदन के सामने रख रहा हूं और मुझे सदस्यों के विवेक पर पूरा भरोसा है कि वे विशेषाधिकार समिति की सिफारिशों पर विचार करेंगे और संविधान, कानून और इस सदन की परंपराओं के अनुसार उचित फैसला लेंगे।

By editor

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