पर्यावरण मंत्रालय ने सोमवार के एक बयान में बताया कि यह धनराशि रेड सैंडर्स का उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं से प्राप्त लाभ-साझेदारी की रकम से दी गई है, जिसे पुनः हितधारकों तक संरक्षण कार्यों के लिए पहुंचाया जा रहा है। यह धनराशि हितधारकों द्वारा प्राप्त बिक्री मूल्य या आय के अतिरिक्त है। यह स्वीकृति जैव विविधता अधिनियम, 2002 (संशोधित 2023) के अंतर्गत पहुंच और लाभ-साझेदारी तंत्र के सफल क्रियान्वयन का उदाहरण है। इस तंत्र के अंतर्गत जैव संसाधनों की पहुंच को नियंत्रित किया जाता है, साथ ही लाभ का न्यायपूर्ण एवं समान बंटवारा स्थानीय समुदायों, व्यक्तियों और जैव विविधता प्रबंधन समितियों तक सुनिश्चित किया जाता है।

रेड सैंडर्स, जो दक्षिणी पूर्वी घाट की मूल प्रजाति है और विशेष रूप से अनंतपुर, चित्तूर, कडपा और कुरनूल जिलों में पाई जाती है, अपने उच्च वाणिज्यिक मूल्य के कारण लंबे समय से तस्करी के गंभीर खतरे में रही है। यह प्रजाति वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत संरक्षित है और लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय में सूचीबद्ध है, जहां इसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कड़े प्रतिबंध हैं।

अब तक एनबीए आंध्र प्रदेश वन विभाग को रेड सैंडर्स के संरक्षण और सुरक्षा गतिविधियों के लिए 31.55 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी कर चुका है। स्थानीय एवं जनजातीय समुदाय नर्सरी विकास, पौधारोपण और दीर्घकालिक देखभाल में भागीदारी करेंगे, जिससे रोज़गार, कौशल विकास और स्थानीय संरक्षकता को बढ़ावा मिलेगा।

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By editor

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