मनोज पाल
आपातकाल के दौर में जब लोकतंत्र की सांसें थम गई थीं, तब जनता पार्टी लोकतंत्र की नई किरण बनकर उभरी। यह वही पार्टी थी जिसने “सिंहासन खाली करो, जनता आती है” का नारा दिया और देश को पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार दी। लेकिन आंतरिक कलह और गुटबाज़ी के चलते यह पार्टी धीरे-धीरे कमजोर होती गई। समय के साथ जब इसका नाम राजनीतिक इतिहास के पन्नों में धुंधला होने लगा, तभी एक नया चेहरा सामने आया—युवा, संघर्षशील और खोजी पत्रकार से बने नेता नवनीत चतुर्वेदी, जिन्होंने जनता पार्टी को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया।

जनता पार्टी की गौरवशाली शुरुआत और बिखराव:- 1977 का आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय बन गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी ने आपातकाल के खिलाफ जनता की आवाज़ को सत्ता तक पहुँचाया और कांग्रेस को पराजित कर मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाया। जनता पार्टी ने साबित कर दिया कि जब जनता जागती है तो सत्ता की कुर्सी भी कांप उठती है।लेकिन यह गौरवशाली यात्रा ज्यादा लंबी नहीं रही। विभिन्न विचारधाराओं और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने पार्टी की नींव हिला दी। धीरे-धीरे जनता पार्टी टूटती चली गई और उसका प्रभाव सीमित रह गया। कभी लोकतंत्र की रक्षक कही जाने वाली यह पार्टी हाशिये पर पहुंच गई।

पुनर्जन्म की कोशिश और नया नेतृत्व:- 2019 में जनता पार्टी ने चुनाव आयोग में फिर से सक्रियता दर्ज कराई और कई राज्यों के चुनावों में हिस्सा लिया। हालांकि बड़े नतीजे नहीं आए, लेकिन यह संकेत जरूर था कि पार्टी अब भी जिंदा है और एक नई ऊर्जा की तलाश में है। यही तलाश पूरी हुई जब सितंबर 2021 में नवनीत चतुर्वेदी को उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और फिर दिसंबर 2021 में राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। तीन महीने के भीतर ही उनकी नेतृत्व क्षमता ने संगठन में नई जान डाल दी।

नवनीत चतुर्वेदी – खोजी पत्रकार से जननेता तक का सफर:- नवनीत चतुर्वेदी का जीवन किसी साधारण राह का परिणाम नहीं है। मूल रूप से बिहार के सारण जिले से ताल्लुक रखने वाले और बीकानेर में पले-बढ़े नवनीत ने शिक्षा के दौरान विज्ञान, इंजीनियरिंग और चार्टर्ड अकाउंटेंसी तक कई विषयों को आजमाया। लेकिन असली पहचान उन्हें मिली खोजी पत्रकार के रूप में। पत्रकारिता के दौरान उन्होंने सत्ता और सिस्टम की परतें खोलकर रख दीं। दूरदर्शन और साधना न्यूज़ से जुड़कर उन्होंने “ओपन कोर्ट” नामक टीवी शो शुरू किया, जिसमें न्याय और जनहित से जुड़े मुद्दों को बेबाकी से सामने रखा। उन्होंने सुब्रमण्यन स्वामी से न सिर्फ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म सीखा बल्कि एक्टिविज़्म की बारीकियों को भी समझा। जीएसपीसी घोटाले और राफेल सौदे जैसे मामलों पर उनकी रिपोर्टिंग ने उन्हें खोजी पत्रकार के रूप में स्थापित किया। उनकी पत्रकारिता ही उन्हें राजनीति की गहरी समझ तक ले गई। 2017 से 2019 के बीच आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तत्कालीन डीजीपी ए.बी. वेंकटेश्वर राव के साथ काम कर उन्होंने प्रशासनिक और इंटेलिजेंस का अनुभव भी हासिल किया। लॉकडाउन के दौरान लिखी उनकी किताब “Geopolitics” बेस्टसेलर बनी, जिसमें भारतीय राजनीति और चुनावों पर बाहरी प्रभावों का गहन विश्लेषण है।

राजनीति ही स्थायित्व और जनता पार्टी का संकल्प:- नवनीत खुद मानते हैं कि पढ़ाई, व्यापार और निजी जीवन में उन्होंने कई प्रयोग किए, लेकिन स्थायित्व केवल राजनीति में मिला। वे कहते हैं कि पिछले बारह वर्षों से राजनीति ही उनकी सच्ची खुशी है और जनता पार्टी को पुनर्जीवित करना उनका संकल्प है। यही कारण है कि गुटबाज़ी और मतभेदों से जूझ रही पार्टी को उन्होंने संगठित करने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली।

भविष्य की ओर नई यात्रा:- आज जनता पार्टी का जनाधार छोटा है लेकिन दृष्टि विशाल है। नवनीत चतुर्वेदी युवाओं को संगठन से जोड़ने पर जोर दे रहे हैं, गुटबाज़ी को खत्म करने में जुटे हैं और पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी खोजी पत्रकारिता से निकली पारदर्शिता की समझ और संघर्षशील नेतृत्व जनता पार्टी को एक बार फिर जनता की आवाज़ बनाने की कोशिश कर रहा है।

नई क्रांति की राह:- जनता पार्टी का इतिहास सिखाता है कि जनता की ताकत सबसे बड़ी ताकत होती है। और नवनीत चतुर्वेदी की कहानी यह दिखाती है कि जब कोई व्यक्ति संघर्ष से उठकर नेतृत्व करता है तो संगठन की टूटी हुई डोर भी फिर से जुड़ सकती है।“सिंहासन खाली करो” का नारा भले ही 1977 में गूंजा था, लेकिन आज यह नारा नई अर्थवत्ता लिए सामने है। जनता पार्टी अब नवनीत चतुर्वेदी के नेतृत्व में फिर से खड़ी हो रही है—इतिहास की मशाल थामे, भविष्य की राह रोशन करने के लिए।
