मनोज पाल (9911711593)

मुज़फ्फरनगर। मुज़फ्फरनगर का टीबी अस्पताल, जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. लोकेश चंद गुप्ता के नेतृत्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘टीबी मुक्त भारत’ के संकल्प को साकार करने की दिशा में बड़ी सफलता की मिसाल बन गया है।
आईसीएमआर चेन्नई द्वारा मुज़फ्फरनगर टीबी अस्पताल को लगातार दो वर्षों तक पुरस्कृत किया गया वर्ष 2022 में ब्रॉन्ज मेडल और 2023 में सिल्वर मेडल। यह सम्मान क्रमशः 20% और 40% तक टीबी मरीजों की संख्या घटाने पर दिया जाता है। इस प्रकार मुज़फ्फरनगर उत्तर प्रदेश का पहला जिला बना जिसने दो वर्षों तक यह उपलब्धि हासिल की। वर्ष 2025 में जनपद को 9,880 टीबी मरीजों की पहचान का लक्ष्य मिला है, लेकिन अब तक केवल 7,500 मरीजों की पहचान ही हुई है| यह बताता है कि जिले में टीबी संक्रमण के मामले लगातार घट रहे हैं। वर्ष 2023 में जिले की 21 ग्राम पंचायतें और 2024 में 58 ग्राम पंचायतें टीबी मुक्त घोषित की गईं, जो अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।

स्वास्थ्य तंत्र की सशक्त भूमिका:-

जिले में 239 आयुष्मान आरोग्य मंदिर संचालित हैं, जहाँ कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर तैनात हैं। इनके साथ करीब 2,500 आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर टीबी मरीजों की खोज करती हैं, नमूना लेती हैं और जांच करवाती हैं। यह नेटवर्क जिले के हर कोने तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहा है। कई मामलों में मरीज स्वयं अस्पताल आते हैं, तो कई बार आशाएं उन्हें खोजकर लाती हैं। इस प्रयास से टीबी की पहचान समय रहते हो रही है और मरीज इलाज के प्रति जागरूक हो रहे हैं।

पहले टीबी का इलाज दो से तीन वर्षों तक चलता था, लेकिन अब यह अवधि घटकर छह माह रह गई है। आधुनिक जीन-आधारित तकनीक (Gene Technology) और NAAT टेस्ट जैसी सुविधाओं से रोग की पहचान अब अधिक सटीक और तेज़ी से होती है। मुज़फ्फरनगर का टीबी अस्पताल अब आधुनिक सुविधाओं से लैस है, जहाँ मरीजों की जांच और उपचार पूरी तरह मुफ्त किया जाता है। खाँसी, बुखार, भूख की कमी, वजन घटना या पसीना आना जैसे लक्षणों पर व्यक्ति को तुरंत जांच करानी चाहिए।

पोषण और सामाजिक सहयोग से टीबी पर विजय:-

टीबी से पीड़ित मरीजों के लिए केंद्र सरकार ने निक्षय पोषण योजना शुरू की है, जिसके तहत मरीज को इलाज के दौरान प्रति माह एक हज़ार रूपये की सहायता राशि दी जाती है। पहले यह राशि पांच सौ रूपये प्रति माह थी, लेकिन नवंबर 2024 से इसे बढ़ाया गया है। यह सहायता सीधे मरीज के बैंक खाते में जाती है, जिससे वह पोषक आहार ले सके और तेजी से स्वस्थ हो सके। डॉक्टरों के अनुसार, टीबी और कुपोषण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं कुपोषण टीबी का कारण भी बन सकता है और परिणाम भी। इसलिए इलाज के साथ पौष्टिक भोजन लेना बेहद जरूरी है।

डॉ. लोकेश चंद गुप्ता ने बताया कि समाज के सक्षम लोग निक्षय मित्र बनकर टीबी मरीजों को गोद ले सकते हैं और उन्हें पोषण पोटली उपलब्ध करा सकते हैं। मुजफ्फरनगर में कई प्रेरक उदाहरण देखने को मिले हैं जिनमे डॉ. मुकेश जैन ने 100 मरीज, डॉ. एम. एल. गर्ग ने 102 मरीज, और साईं संस्थान ने 150 मरीजों को गोद लिया है और भी ऐसे अनोखे उदाहरण है जो निक्षय मित्र टीबी के मरीजों को गोद ले रहे हैं |। इस पहल से समाज में एक नई सोच विकसित हुई है कि किसी भी मरीज की सहायता सीधे की जा सकती है, बिना किसी बिचौलिए के।

जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार:-

स्वास्थ्य विभाग द्वारा समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं ताकि लोग टीबी के लक्षणों को पहचान सकें और समय पर जांच कराएं। डॉ. लोकेश चंद गुप्ता ने बताया कि पहले लोगों में टीवी को लेकर झिझक थी, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। लोग स्वयं जांच कराने आगे आ रहे हैं और इलाज पूरा करने में भी रुचि दिखा रहे हैं। टीबी केवल फेफड़ों में नहीं होती यह हड्डियों, आँखों, पेट, दिमाग, या शरीर के अन्य अंगों में भी हो सकती है। केवल नाखून और बालों में टीबी नहीं होती। यह एक संक्रामक रोग है जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक बैक्टीरिया से होता है और यह हवा के माध्यम से फैल सकता है। टीबी से बचने के लिए स्वच्छता, संतुलित भोजन, और समय पर इलाज अत्यंत आवश्यक है।

डॉ. लोकेश चंद गुप्ता के नेतृत्व में मुज़फ्फरनगर का टीबी अस्पताल आज टीबी मुक्त भारत मिशन का एक प्रेरणादायक मॉडल बन चुका है। जहाँ पहले इलाज वर्षों तक चलता था, वहीं अब आधुनिक तकनीक, सरकारी योजनाओं और सामाजिक भागीदारी से यह रोग न केवल काबू में है बल्कि गाँव-गाँव से खत्म हो रहा है।

मुज़फ्फरनगर ने यह साबित किया है कि अगर स्वास्थ्य सेवाएं, जागरूकता और सामाजिक सहयोग एक साथ काम करें, तो टीबी जैसी बीमारी को जड़ से मिटाया जा सकता है। अब समय है कि हर नागरिक निक्षय मित्र बने, जरूरतमंद मरीजों तक पोषण और सहयोग पहुँचाए, और इस संकल्प को आगे बढ़ाए |

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