पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा गुरूवार काे यहां जारी एक संयुक्त बयान में जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान इस्लामी गणराज्य, तुर्किये, जिबूती , सऊदी अरब , ओमान , गाम्बिया, फ़िलिस्तीन, क़तर, कुवैत, लीबिया, मलेशिया, मिस्र, नाइजीरिया, अरब देशाें के संघ और इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) ने क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों को हड़पने के दो मसौदा क़ानूनों को इज़राइली संसद ‘नेसेट’ द्वारा मंज़ूरी दिए जाने की निंदा की।

बयान में इन विधायी उपायों को “अंतर्राष्ट्रीय कानून” और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 का घोर उल्लंघन बताया गया है। यह प्रस्ताव पूर्वी यरुशलम सहित, कब्जे वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों की जनसांख्यिकीय संरचना और स्थिति को बदलने के उद्देश्य से की गई सभी इज़राइली कार्रवाइयों को अस्वीकार करता है। बयान में कहा गया है कि कब्जे वाले फ़िलिस्तीनी भूभाग के किसी भी हिस्से पर किसी भी प्रकार की इजराइली संप्रभुता नहीं है।

इस बीच इन देशों ने बुधवार को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) के उस मशवरे का भी स्वागत किया, जिसमें गाजा सहित, कब्जे वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों की आबादी के लिए आवश्यक आपूर्ति और मानवीय राहत सामग्री की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए इज़राइल की जिम्मेदारी तय की गयी है। आईसीजे के फैसले ने युद्ध के एक तरीके के रूप में ‘भुखमरी’ के इस्तेमाल पर अपनी आपत्ति को दोहराया और गाजा में सहायता पहुंचाने में अड़ंगा डालने के लिए इज़राइल की आलाेचना की।

बयान में फ़िलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय और स्वतंत्र राज्य के अधिकार को भी रेखांकित किया गया, और कहा गया कि पूर्वी यरुशलम पर इज़राइल के क्षेत्रीय दावों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने “अमान्य” घोषित किया है।

संयुक्त घोषणापत्र में इज़राइल को उसकी अवैध और एकतरफ़ा कार्रवाइयों को जारी रखने के ख़िलाफ़ चेतावनी दी गई है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का आह्वान किया गया कि वह इज़राइल को उसके अवैध कार्यों को रोकने के लिए मजबूर करके अपनी नैतिक और क़ानूनी ज़िम्मेदारियाँ निभाए। इसमें ज़ोर दिया गया कि 1967 की सीमाओं के भीतर एक संप्रभु और स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य, इस क्षेत्र में न्यायपूर्ण और स्थायी शांति प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता है। इस फिलिस्तीनी राज्य की राजधानी पूर्वी यरुशलम होनी चाहिए।

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