भले ही देश को आजाद हुए 79 साल पूरे हो चुके हैं लेकिन इस आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों की अहम भूमिका रही है। एक समय था जब क्रांतिकारी कानपुर में रहकर अंग्रेजो से लोहा लेते थे। समाजसेवी सर्वेश पांडेय उर्फ निन्नी बताते हैं कि 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम नाना राव पेशवा द्वितीय के नेतृत्व में हुआ था। उनके इस आंदोलन को तात्या टोपे और अजीमुल्ला खान ने सहयोग दिया था। इस आंदोलन में बड़े पैमाने पर अंग्रेजी हुकूमत का का विरोध हुआ था। साथ ही सत्तीचौरा और बीबीगढ़ कांड इसी विद्रोह से जुड़े है।

उन दिनों ब्रिटिश सरकार की कई कपड़ा मिलें कानपुर में संचालित हो रहीं थीं। जिसका सीधा लाभ अंग्रेजी हुकूमत को हो रहा था। उन्हें आर्थिक रूप से चोट पहुंचाने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आवाहन पर जनपद में ब्रिटिश कपड़ो का बहिष्कार हुआ था। कपड़ा मिलों में काम करने वाले भारतीय मजदूरों ने भी हड़ताल कर दी। जिससे अंग्रेजी हुक़ूमत को काफी नुक्सान हुआ था। पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी इस आंदोलन में अपना सहयोग देते हुए अपने अखबार प्रताप के जरिये आंदोलन को गति दी।

शहीद भगत सिंह पंजाब से आने के बाद कानपुर में काफी समय तक रहे। यहां पर उन्होंने फीलखाना स्थित गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार प्रताप में अपना नाम बदल बलवंत सिंह के नाम से पत्रकारिता करते थे। यहीं पर उनकी मुलाकात चंद्रशेखर आजाद से हुई थी। आजाद यहां काफी समय तक भूमिगत रहे।

महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन को समर्थन देते हुए कानपुर में कई जुलूस निकाले गए। इतना ही नहीं मजदूरों और विद्यार्थियों ने भी गिरफ्तारी दी थी।

इसी बीच साल 1931 को पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी साम्प्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ गए और उनका नाम शहीदों में दर्ज ही गया।

महात्मा गांधी का भारत छोड़ो आंदोलन का कानपुर में बड़ा असर देखने को मिला। जहां तमाम क्रांतिकारियों ने गिरफ्तारियां दी थी।

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