कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के खिलाफ चल रही जंग में अब अंतरिक्ष विज्ञान ने एक ऐसी छलांग लगाई है, जिसने चिकित्सा जगत की तस्वीर बदल दी है। नासा (NASA) और दवा निर्माता कंपनी मर्क (Merck) के बीच हुए एक ऐतिहासिक गठबंधन ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) को एक ‘सुपर लैब’ में तब्दील कर दिया। यहां शून्य गुरुत्वाकर्षण (माइक्रोग्रैविटी) की मदद से कैंसर की एक ऐसी दवा विकसित की गई है, जो इलाज के दर्दनाक और लंबे घंटों को महज चंद मिनटों में समेट देगी।

पेश है अंतरिक्ष से आई इस मेडिकल क्रांति की पूरी रिपोर्ट:
2 घंटे की ड्रिप का काम अब 2 मिनट के इंजेक्शन से

कैंसर रोगियों के लिए सबसे बड़ी राहत की खबर यह है कि अब उन्हें अस्पताल के बिस्तर पर घंटों तक ड्रिप (IV) चढ़वाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पहले मरीजों को नस के जरिए दवा लेने के लिए क्लिनिक में 1 से 2 घंटे बिताने पड़ते थे।

नई खोज: अंतरिक्ष में तैयार किए गए दवा के विशेष ‘क्रिस्टल्स’ की बदौलत अब इसे एक छोटे इंजेक्शन में बदल दिया गया है। इसे त्वचा के नीचे (Subcutaneous) सिर्फ 1 से 2 मिनट में लगाया जा सकता है।  हर तीन हफ्ते में लगने वाला यह इंजेक्शन न सिर्फ समय बचाएगा, बल्कि इलाज के खर्च में भी कमी लाएगा। इसे अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने अपनी हरी झंडी दे दी है।

अंतरिक्ष में क्यों बनी बेहतर दवा?
शायद आप सोच रहे होंगे कि जो काम धरती पर नहीं हुआ, वो अंतरिक्ष में कैसे मुमकिन हुआ? इसका जवाब है ‘ग्रैविटी का अभाव’। धरती पर गुरुत्वाकर्षण की वजह से जब दवा के कण (क्रिस्टल) बनाए जाते हैं, तो खिंचाव के कारण वे आपस में मिल जाते हैं, छोटे रह जाते हैं या असमान आकार के बनते हैं। लेकिन 

अंतरिक्ष में खिंचाव न होने के कारण:
दवा के कण बहुत साफ, बड़े और एक समान आकार के बनते हैं।
इन बेहतर क्रिस्टल्स की वजह से वैज्ञानिक यह सटीक समझ पाए कि दवा शरीर के भीतर कैसे काम करेगी।
क्रिस्टल्स की बेहतर गुणवत्ता ने ही इसे इंजेक्शन के रूप में ढालना संभव बनाया।

इस स्पेस मिशन का पृथ्वी पर असर
नासा का यह प्रयोग केवल अंतरिक्ष यात्रियों तक सीमित नहीं है। इस सफलता ने भविष्य के इलाज के कई नए रास्ते खोल दिए हैं: अब पृथ्वी पर भी अन्य दवाओं को बेहतर और तेजी से बनाने में मदद मिलेगी। नासा के अनुसार, अंतरिक्ष में की जाने वाली रिसर्च का असली मकसद पृथ्वी पर रहने वाले करोड़ों लोगों के जीवन को सुगम बनाना है। यह तकनीक न केवल कैंसर रोगियों के काम आएगी, बल्कि भविष्य में चांद और मंगल जैसे लंबे मिशनों पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स की सेहत की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण आधार बनेगी। 

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