इस अवसर पर डॉ. कमल पाठक ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में इस गीत ने एकजुटता और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। उन्होंने कहा कि सन 1857 में स्वतंत्रता के पहले संग्राम का बिगुल बजा और प्रबुद्ध नागरिकों ने अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ बोलना शुरू किया। वंदे मातरम् ने जनमानस को उद्वेलित कर देशभक्ति की ज्योति प्रज्वलित की। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, यह भारत माता की आराधना है, हमारे राष्ट्रीय चरित्र की आत्मा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को स्मरण रखना किसी भी समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

कार्यक्रम में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन और वंदे मातरम् की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित प्रदर्शनी भी लगाई गई।

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