अपने संबोधन में विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि सच्चे अर्थों में लोकतंत्र केवल चुनावी प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह समानता, उत्तरदायित्व और नागरिक सहभागिता की जीवंत संस्कृति के रूप में विकसित होना चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुदृढ़ता और नैतिक शासन व्यवस्था ही जनविश्वास को बनाए रखने की कुंजी है। किसी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं आंकी जाती कि वहां कितनी बार चुनाव होते हैं, बल्कि इस बात से कि उसकी संस्थाएं कितनी निष्पक्ष हैं, प्रतिनिधित्व कितना समावेशी है और शासक वर्ग का विवेक कितना जागृत है।

भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का उल्लेख करते हुए विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि 1993 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधनों द्वारा पंचायती राज और नगरीय निकायों को संवैधानिक दर्जा मिला और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया गया। इस ऐतिहासिक सुधार ने लगभग 14 लाख महिलाओं को सक्रिय जनजीवन में भागीदारी का अवसर दिया और जमीनी लोकतंत्र की संरचना को नई दिशा दी। इसी क्रम में उन्होंने संसद द्वारा पारित संविधान (128वां संशोधन) विधेयक, 2023 का उल्लेख किया, जिसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया गया है, जिसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें भी सम्मिलित हैं। इसे उन्होंने “लैंगिक न्याय और सहभागी लोकतंत्र की दिशा में एक नैतिक एवं संवैधानिक मील का पत्थर” बताया।

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने पिछले एक दशक में भारत में हुए अनेक चुनावी एवं संस्थागत सुधारों का उल्लेख किया, जिनसे पारदर्शिता, सुगमता और जनविश्वास को मज़बूती मिली है। इनमें प्रवासी भारतीयों को मतदान का अधिकार, ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में ‘नोटा’ विकल्प, तथा वीवीपैट प्रणाली का समावेश शामिल हैं। उन्होंने उच्चतम न्यायालय द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4) को निरस्त करने के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि इस निर्णय से दोषसिद्ध विधायकों की तत्काल अयोग्यता सुनिश्चित हुई और समाज जीवन में जवाबदेही को सुदृढ़ किया गया।

विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि राज्य विधान सभाएं भारत की संघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ हैं। ये न केवल विधायी संस्थाएं हैं, बल्कि संविधान के आदर्शों को जनजीवन में उतारने की प्रयोगशालाएं भी हैं। विधान सभाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और लोक व्यवस्था जैसे विषयों पर कानून बनाती हैं, बजट की निगरानी करती हैं और कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाती हैं। यदि संसद राष्ट्र की इच्छा का प्रतीक है, तो विधान सभाएं जनता की आवाज का प्रतिबिंब हैं।

विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र, पारदर्शिता और विकेंद्रीकरण संस्थागत विश्वास के तीन स्थायी स्तंभ हैं। राष्ट्रमंडल के सभी देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने के लिए केवल प्रक्रियागत सुधार ही नहीं, बल्कि जनजीवन में नैतिक पुनर्जागरण की भी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सच्चा लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं टिकता— यह नैतिक नेतृत्व, उत्तरदायी नागरिकता और सेवाभाव से प्रेरित जनप्रतिनिधियों के विवेक पर आधारित होता है।

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