यह बात हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (एचआईएमएसआर) के परिवेशी वायु प्रदूषण नामक अध्ययन से सामने आई है। जिसे प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. अरुणा निगम के नेतृत्व में डॉ. नेहा भारद्वाज ने संपन्न किया है। अध्ययन में 25 से 35 वर्ष आयु की 1155 गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया। इस दौरान महिला और भ्रूण की प्रत्येक तीन माह में चिकित्सकीय जांच की गई, तो पता चला कि वायु प्रदूषण का गर्भावस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

इस दौरान समय से पहले जन्म (आठवें महीने से कम) के मामले 10 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में देखे गए, जिसके पीछे पीएम 2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और ओजोन जैसे प्रदूषित हवा के संपर्क में आना प्रमुख वजह रही। यानि वायु प्रदूषण के चलते 10 प्रतिशत शिशुओं के जन्म 40 हफ्ते की बजाय 37 हफ्ते में ही हो रहे हैं। वहीं, दूसरे ट्राइमेस्टर (3-6 महीने) के समय और आठवें महीने से पहले डिलीवरी के मामले में ओजोन का महत्वपूर्ण संबंध पाया गया, जबकि शुरुआती 3 महीने के दौरान पीएम 2.5 और पीएम 10 के संपर्क में आने वाली गर्भवती महिलाओं के 19 प्रतिशत शिशु (भ्रूण) पूरी तरह से विकसित नहीं हो सके थे।

अध्ययन के दौरान शिशुओं का जन्म के समय वजन भी कम पाया गया। जिसके चलते भविष्य में उनके कद-काठी से लेकर श्वसन प्रक्रिया तक पर गंभीर असर पड़ना लाजिमी है। यानि वायु प्रदूषण ने गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों में इजाफा कर दिया है।

डॉ. अरुणा निगम ने बताया कि गर्भवती महिलाओं पर वायु प्रदूषण के प्रभाव की जांच के लिए मां के निवास स्थान की पुष्टि की गई। इस दौरान गर्भवती महिला के अंतिम मासिक धर्म की तारीख से प्रतिदिन सुबह 7 बजे उनके पते के पास मौजूद वायु निगरानी स्टेशनों के वायु गुणवत्ता इंडेक्स डेटा का विश्लेषण किया गया।

उन्होंने कहा कि अब तक उत्तरी भारत से ऐसा कोई अध्ययन प्रकाशित नहीं हुआ है जो वायु प्रदूषण के संपर्क और गर्भावस्था के साथ-साथ नवजात शिशु जन्म के परिणाम के बीच संबंध की जांच करता हो। उन्होंने कहा कि हमें वायु प्रदूषण को कम करने के लिए प्रभावी ढंग से काम करना चाहिए ताकि देश का भविष्य स्वस्थ रूप से जन्म ले सके।

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