मनोज पाल (9911711593)
धर्मेंद्र का निधन ऐसी घटना है जिसे सुनते ही मन अचानक भारी हो जाता है, जैसे किसी ने भीतर से साँस खींच ली हो। यह एहसास किसी सेलिब्रिटी के चले जाने का नहीं, बल्कि अपने घर के बड़े-बुज़ुर्ग के खो जाने जैसा है—वह व्यक्ति जिसे हमने शायद कभी छुआ नहीं, लेकिन जिसकी उपस्थिति हमारे जीवन का हिस्सा थी। आज जब यह सच्चाई सामने आई कि धर्मेंद्र अब नहीं रहे, तो लगा जैसे भारत के हर घर के भीतर से कोई पुराना, भरोसेमंद, स्थिर सहारा खिसक गया।
धर्मेंद्र की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं थी कि वह सुपरस्टार थे, बल्कि यह कि वह दर्शकों के लिए अजनबी नहीं थे। उन्हें देखते हुए कभी दूरी महसूस नहीं होती थी। उनका चेहरा किसी ऐसे इंसान का चेहरा लगता था जिसे आपने कहीं न कहीं ज़रूर देखा है—किसी मेले में, किसी सड़क पर, किसी खेत में, किसी परिवार की तस्वीर में। उनकी आँखों में हमेशा एक अनोखी गंभीरता होती थी, मानो उन्होंने जीवन की कठिनाइयों को बारीकी से महसूस किया हो और वही अनुभव वे हर फ्रेम में लेकर आते हों।
उनके जाने से जो दर्द पैदा हुआ है, वह सिर्फ़ इसलिए नहीं कि एक दिग्गज अभिनेता दुनिया से चला गया; बल्कि इसलिए कि वे हमारे सामूहिक इतिहास का हिस्सा थे। उनकी फिल्में हमारी पीढ़ियों की धड़कनों में शामिल हैं। जब हम शोले देखते हैं तो वीरू की आवाज़ दिल में उतरती है; सत्यकाम में उनका आंतरिक संघर्ष हमें अपने ही संघर्षों की याद दिलाता है; चुपके-चुपके देखते हुए जो सहज मुस्कान आती है, वह अब एक दर्द बनकर लौट रही है क्योंकि वह मुस्कान देने वाला चेहरा अब हमेशा के लिए थम गया है।
उनकी मौत किसी प्राकृतिक विदाई जैसी होती तो शायद इतना दर्द न होता, लेकिन धर्मेंद्र उन दुर्लभ कलाकारों में से थे जिन्हें लोग सिर्फ़ स्क्रीन पर नहीं, अपने निजी जीवन में भी ज़रूरत महसूस करते थे। उनकी सरलता किताबों में वर्णित सादगी जैसी नहीं थी—वह असली थी। वह इस बात की याद दिलाती थी कि चमकते चेहरे भी नरम दिल रखते हैं, और सफलता के पहाड़ पर खड़े होकर भी इंसान विनम्र रह सकता है।आज जब उनकी अंतिम यात्रा की ख़बरें आईं, तो सोचना भी मुश्किल हो गया कि वह शरीर, जिसने इतने दशकों तक दर्शकों को जगा कर रखा, आज सफ़ेद चादर में ढँककर शांत पड़ा होगा। किसी बेटे ने उनके हाथों को आखिरी बार पकड़ा होगा। किसी परिवारजन ने उनके बाल सहलाकर खुद को समझाया होगा कि यही अंतिम क्षण हैं।
किसी ने शायद उनके स्थिर चेहरे को देखकर खुद को यही कहा होगा कि “अब यह चेहरा सिर्फ़ यादों में बचेगा।” इतना सोचते ही मन में एक अजीब सी टीस उठती है—हमारे दिलों में जितना प्रेम था, उससे कहीं ज्यादा अनुपस्थिति का दर्द अचानक हमारे सामने खड़ा हो गया है।धर्मेंद्र का जाना एक ऐसी खबर है जो सिर्फ़ आँखें ही नहीं, दिल भी भिगो देती है। इस बात में बहुत कड़वी सच्चाई है कि आज हमने सिर्फ़ एक इंसान नहीं खोया—हमने उन दिनों की खुशबू खो दी जिनमें भारतीय सिनेमा सच्चाई से साँस लेता था। हमने वह चेहरा खो दिया जिसे देखकर लगता था कि खुरदरे समयों में भी अच्छाई मौजूद है।
उनकी मुस्कान, उनका अंदाज़, उनका अपनापन—ये सारी चीजें अब इतिहास बन गईं, और इतिहास भी ऐसा जो पढ़ते हुए रोने का मन करे।धर्मेंद्र चले गए। पर जितना वे जीवन में हमारे लिए ज़रूरी थे, उतना ही अब उनकी अनुपस्थिति भी हमारे भीतर ज़रूरत बनकर चुभ रही है। वे इस दुनिया से गए ज़रूर हैं, पर हम जैसे करोड़ों दिलों से उनका जाना अभी स्वीकार नहीं किया जा पा रहा। यही उनकी महानता है—कि उनका जीवन जितना गहरा था, उनकी विदाई उतनी ही असहनीय।
