लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए भूकंप जैसा था आपातकाल : उपराष्ट्रपति

-कहा, तत्कालीन प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत हितों को सर्वोपरि रखते हुए कैबिनेट को दरकिनार कर राष्ट्रव्यापी आपातकाल लागू किया और राष्ट्रपति ने संवैधानिक मर्यादाओं की उपेक्षा कर किये इस पर हस्ताक्षर

नैनीताल, 25 जून (हि.स.)। देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि आज से पचास वर्ष पूर्व, इसी दिन लोकतंत्र को नष्ट कर देने वाला ‘आपातकाल’ थोप दिया गया था, जो लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए भूकंप से कम नहीं था। उन्होंने इस कालखंड को भारतीय लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय समय बताया। उन्होंने कहा कि उस समय की प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत हितों को सर्वोपरि रखते हुए कैबिनेट को दरकिनार कर राष्ट्रव्यापी आपातकाल की घोषणा करवाई और राष्ट्रपति ने संवैधानिक मर्यादाओं की उपेक्षा कर इस पर हस्ताक्षर कर दिये।

उपराष्ट्रपति धनखड़ बुधवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के 50 वर्ष पूरे होने पर आयोजित स्वर्ण जयंती समारोह में विद्यार्थियों, प्राध्यापकों एवं अन्य गणमान्य लोगों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आपातकाल के दौरान लगभग 1.4 लाख लोगों को जेलों में डाल दिया गया था। उन्हें न्यायपालिका तक पहुंच भी नहीं मिली। तब मौलिक अधिकारों की रक्षा संभव नहीं थी, लेकिन इनमें से कुछ लोग बाद में इस देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बने। उस दौरान नौ उच्च न्यायालयों ने मौलिक अधिकारों की स्थिरता पर बल दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश सर्वोच्च न्यायालय ने इन निर्णयों को पलट दिया और कहा कि कार्यपालिका के निर्णय न्यायिक समीक्षा से परे हैं। इससे लोकतंत्र को भारी आघात लगा।

उन्होंने कहा कि ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाने का उद्देश्य युवाओं को इस अंधकारमय इतिहास से अवगत कराना है ताकि वे इसे भूलें नहीं और इस तरह की घटना दोबारा न दोहराई जाए। उन्होंने न्यायमूर्ति एचआर खन्ना के साहसिक असहमति मत का उल्लेख करते हुए उन्हें लोकतंत्र का प्रहरी बताया। समारोह से पूर्व उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय परिसर स्थित हरमिटेज भवन में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के अंतर्गत अपने पूज्य माता-पिता के नाम पर दो पौधों का पौधरोपण भी किया।

शिक्षा संस्थानों की भूमिका व नवाचार

उपराष्ट्रपति ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान केवल प्रमाणपत्र देने के केंद्र नहीं, बल्कि विचार और नवाचार के स्वाभाविक जैविक स्थल होते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि ये परिसर ही हैं जहाँ भविष्य की दिशा तय होती है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे न केवल अपने भविष्य का निर्माण करें बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी भागीदार बनें। उन्होंने विद्यार्थियों को संदेश दिया-‘जस्ट डू इट-टू इट नाव’ यानी कार्य को अभी करो-तत्काल करो।

पूर्व छात्रों के योगदान की महत्ता बतायी

श्री धनखड़ ने विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों को संस्था की शक्ति बताते हुए कहा कि विकसित देशों में पूर्व छात्र संस्थान के आर्थिक और बौद्धिक विकास में मुख्य भूमिका निभाते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय भी 50 वर्षों के अपने पूर्व छात्रों को संगठित कर एक स्थायी निधि बनाए, जिससे आत्मनिर्भरता को बल मिल सके। उन्होंने कहा कि यदि 1,00,000 पूर्व छात्र 10,000 रुपये प्रति वर्ष योगदान दें, तो विश्वविद्यालय के पास 100 करोड़ रुपये की वार्षिक निधि तैयार हो सकती है।

राज्यपाल ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों की सराहना की

कार्यक्रम में उपस्थित राज्यपाल सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने विश्वविद्यालय की स्वर्ण जयंती पर कहा कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय ने विगत 50 वर्षों में न केवल शैक्षणिक उपलब्धियाँ अर्जित की हैं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक ज्ञान का प्रकाश पहुँचाया है। उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगारपरक प्रशिक्षण और सामाजिक चेतना के साथ जोड़कर ही देश का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों का दायित्व युवाओं को शिक्षित करने के साथ-साथ उन्हें उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है।

इस अवसर पर उत्तराखंड के उच्च शिक्षा, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत, नैनीताल की विधायक नैनीताल सरिता आर्य, भीमताल के विधायक राम सिंह कैड़ा, पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र पाल, कुमाऊँ मंडल के आयुक्त दीपक रावत, पुलिस महानिरीक्षक रिद्धिम अग्रवाल, जिलाधिकारी वंदना सिंह, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.ओपीएस नेगी, गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.मनमोहन सिंह चौहान सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।

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