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नई दिल्ली/शिमला, 03 मार्च । हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने मंगलवार को नई दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर राज्य के लिए विशेष केंद्रीय सहायता (स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस) के तहत वित्तीय पैकेज देने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री ने वित्त वर्ष 2026-27 में संभावित राजस्व घाटे की भरपाई के लिए केंद्र से मदद मांगी और कहा कि राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने से राज्य की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

मुख्यमंत्री सुक्खू ने बैठक में कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे और पहाड़ी राज्य की तुलना बड़े राज्यों से करना उचित नहीं है। उनका कहना रहा कि बड़े राज्य आरडीजी बंद होने से पैदा हुई परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं, लेकिन हिमाचल की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नहीं है कि वह इस झटके को आसानी से सहन कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि सभी राज्यों का आकलन एक ही मापदंड पर करना व्यावहारिक नहीं है।

मुख्यमंत्री सुक्खू ने केंद्रीय वित्त मंत्री को बताया कि नगालैंड के बाद हिमाचल प्रदेश को आरडीजी के रूप में लगभग 12.7 प्रतिशत हिस्सा मिलता रहा है, जो देश में दूसरा सबसे अधिक था। उन्होंने आरडीजी बंद करने के फैसले को सहकारी संघवाद (कोऑपरेटिव फेडरलिज्म) की भावना के विपरीत बताया। मुख्यमंत्री ने संविधान के अनुच्छेद 275(1) का हवाला देते हुए कहा कि इसमें राज्यों को उनके राजस्व और व्यय के अंतर को पाटने के लिए अनुदान देने का प्रावधान है। उनका कहना रहा कि पहली बार ऐसा हुआ है कि वित्त आयोग ने छोटे पहाड़ी राज्यों की विशेष विकास जरूरतों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।

मुख्यमंत्री सुक्खू ने यह भी बताया कि राज्य सरकार ने पिछले दो-तीन वर्षों में खर्च कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने कोई ऑफ-बजट उधारी नहीं ली है और विभिन्न सेस के माध्यम से हर साल करीब 600 करोड़ रुपये जुटाए जा रहे हैं। इसके बावजूद जीएसटी लागू होने के बाद राज्य के राजस्व पर दबाव बढ़ा है। सुक्खू ने कहा कि टैक्स दरों में आवश्यक बढ़ोतरी और सब्सिडी के युक्तिकरण जैसे उपाय लागू करने के बाद भी राजस्व घाटे को पूरी तरह कम करना संभव नहीं हो पा रहा है।

मुख्यमंत्री ने पहाड़ी राज्यों की आर्थिक स्थिति का सही आकलन करने और सुधार के उपाय सुझाने के लिए एक विशेष समिति गठित करने का भी अनुरोध किया। बैठक के दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री ने राज्य की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया।

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