यात्रा के बारे में जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि अफगानिस्तान से हमारा केवल इल्मी (शैक्षिक) और रूहानी (आध्यात्मिक) संबंध नहीं है, बल्कि इसके साथ हमारे सांस्कृतिक रिश्ते भी रहे हैं।

उन्होंने कहा कि बात यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की आज़ादी की जंग से भी अफगानिस्तान का एक विशेष संबंध रहा है। आज की नई पीढ़ी शायद इस बात से परिचित न हो, लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान दारुल उलूम देवबंद के प्रधान अध्यापक शेख़-उल-हिंद मौलाना महमूद हसन (रह.) के आदेश पर अफगानिस्तान में ही हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने एक निर्वासित सरकार क़ायम की थी। उस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप सिंह, प्रधानमंत्री मौलान बरकतुल्लाह भोपाली और विदेश मंत्री मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी थे।

अपने देवबंद दौरे के दौरान मौलाना अमीर ख़ान मुत्ताकी ने दारुल उलूम से अपने संबंध और अकीदत (श्रद्धा) को व्यक्त करते हुए बार-बार इसे मदर-ए-इल्मी और रूहानी मरकज़ (ज्ञान और आत्मा का केंद्र) कहकर संबोधित किया।

इसकी वजह यह है कि अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मूलरूप से एक आलिम-ए-दीन (धार्मिक विद्वान) हैं और उन्होंने पाकिस्तान के उस मदरसे से शिक्षा प्राप्त की है, जिसकी नींव महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) के एक शिष्य मौलाना अब्दुल हक़ ने रखी थी।

इसी विशेष संबंध के आधार पर देवबंद पहुंचने के बाद अफगानिस्तान के विदेश मंत्री ने दारुल उलूम देवबंद के कुलपति मौलाना कासिम नोमानी, जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और प्रधान अध्यापक मौलाना अरशद मदनी समेत दीगर लोगों से विशेष भेंट भी की।

मीडिया के सवालों के जवाब में मौलाना मदनी ने कहा कि दारुल उलूम देवबंद की ख्याति विश्वव्यापी है और यहां पूरी दुनिया से छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते हैं जिनमें अफगानिस्तान के छात्र भी शामिल हैं। विदेशी और विशेष रूप से इस्लामी देशों से जो लोग भारत आते हैं, वह दारुल उलूम देवबंद को देखने की इच्छा अवश्य रखते हैं। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री का देवबंद दौरा उसी क्रम की एक कड़ी है, लेकिन इसके पीछे इल्मी, रूहानी, सांस्कृतिक और तहज़ीबी कारक भी हैं।

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