राजनीति में वक्त पर साथ और वक्त के बाद पहचान का फर्क अक्सर सामने आता है। चुनावी पटरी पर आम आदमी पार्टी में शामिल होने वाले नेताओं के साथ भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है जिनको चुनाव के बाद पहचान नहीं मिल रही। ताजा मामला में पिछले साल जून में हुए हल्का वेस्ट उपचुनाव के दौरान भाजपा छोड़कर आम आदमी पार्टी में शामिल हुए युवा नेता हरीश बाहरी ने महज 9 महीने के भीतर ही पार्टी को अलविदा कह दिया। मंगलवार सुबह फेसबुक पोस्ट के जरिए उन्होंने पार्टी की नीतियों और कार्यशैली पर कटाक्ष करते हुए इस्तीफे का ऐलान किया।

बाहरी ने अपने पोस्ट में तंज कसते हुए लिखा आम आदमी पार्टी ने मुझे इतना मान-सम्मान दिया कि मैं इस्तीफा दे रहा हूं। इस एक लाइन ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या चुनाव के समय जोड़े गए नेताओं को बाद में नजरअंदाज कर दिया जाता है? गौरतलब है कि बाहरी उपचुनाव के दौरान संजीव अरोड़ा के समर्थन में भाजपा छोड़कर आप में शामिल हुए थे। उनका आरोप है कि पार्टी की सीनियर लीडरशिप ने उन्हें शामिल तो कराया, लेकिन चुनाव खत्म होते ही न तो हल्का नॉर्थ के विधायक मदन लाल बग्गा और न ही किसी अन्य नेता ने उनकी सुध ली।

औ
यहां तक कि इलाके के सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। बाहरी ने आरोप लगाया कि उपचुनाव के दौरान उनका पूरी तरह इस्तेमाल किया गया और बाद में उन्हें दरकिनार कर दिया गया। बता दें यह पहला मामला नहीं है, जब पंजाब में आम आदमी पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया हो। इससे पहले भी कई नेता समय-समय पर पार्टी की कार्यप्रणाली और नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए इस्तीफा दे चुके हैं। हरीश बाहरी का इस्तीफा कहीं न कहीं इस सवाल को फिर जिंदा करता है कि क्या आप चुनावी गणित के बाद अपने ही सिपाहियों को भूल जाती है। अगर ऐसा है तो भविष्य में यह ट्रेंड किसी भी पार्टी खासकर आप की साख और संगठन दोनों पर भारी पड़ सकता है।
