मुजफ्फ़ऱनगर। जनपद की सियासत में खास वजूद रखने वाले स्वरूप परिवार को भाजपा में शामिल होना रास आ गया है। स्वरूप परिवार की बहू मीनाक्षी स्वरूप ने चेयरमैनी का चुनाव जीत कर स्वरूप परिवार की राजनीति को संजीवनी प्रदान करने के साथ ही अपने ससुर चितरंजन स्वरूप के सपने को साकार किया है, जो 33 और 23 वर्ष पूर्व दो बार चेयरमैनी का चुनाव हार गये थे।

पिछले दिनों भाजपा में शामिल हुआ स्वरूप परिवार अब पूरी तरह से भगवामय हो गया है। नगरपालिका अध्यक्ष पद के लिए भाजपा ने पूर्व मंत्री चितरंजन स्वरूप की पुत्रवधू और गौरव स्वरूप की पत्नी मीनाक्षी को टिकट दिया, तो परिवार के बाकी सदस्यों ने भी सपा छोड़ भाजपा ज्वाइन कर ली। इस तरह भगवा ब्रिगेड से 56 साल तक टक्कर लेते-लेते स्वरूप परिवार पूरी तरह से भगवा हो गया।

इसके साथ ही जिले में भाजपा के विरोध का एक बड़ा अध्याय भी स्वयं समाप्त हो गया।जिले के स्वरूप परिवार का सियासत से सबसे पुराना नाता रहा है। 1967 में इसी परिवार के विष्णु स्वरूप निर्दलीय विधायक चुने गए थे। 1974 में कांग्रेस के टिकट पर विष्णु स्वरूप के भाई चितरंजन स्वरूप पहली बार  विधायक बने थे। उन्होंने जनसंघ की प्रत्याशी रहीं मालती शर्मा को हराया था। 2002 विधानसभा चुनाव में चितरंजन स्वरूप ने सदर विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर भाजपा के कपिल देव को हराया। 2012 में चितरंजन स्वरूप सपा के टिकट पर ही सदर विधानसभा चुनाव जीत कर प्रदेश सरकार में नगर विकास राज्यमंत्री बने।

2016 में  स्वर्गीय चितरंजन स्वरूप के हुए आकस्मिक निधन के बाद हुए उपचुनाव में बेटे गौरव स्वरूप हार गए। 2017 के मुख्य चुनाव में भी उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 2022 विधानसभा चुनाव में उन्होंने सपा से टिकट मांगा लेकिन पार्टी ने उनके छोटे भाई सौरभ स्वरूप बंटी को प्रत्याशी बना दिया, जिससे नाराज होकर उन्होंने सपा को अलविदा कह भाजपा ज्वाइन कर ली। हालांकि विधानसभा चुनाव में सौरभ स्वरूप भी हार गए।

मुजफ्फरनगर नगर पालिका अध्यक्ष पद महिला के लिए आरक्षित होने से पुरुष राजनीतिज्ञों को चुनाव से दूर रहना पड़ा। बावजूद इसके पालिका की सियासत को अपने कब्जे में रखने के लिए राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी पत्नियों को मैदान में उतार दिया। नतीजा यह रहा कि 2022 में सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए स्वर्गीय चितरंजन स्वरूप के बेटे गौरव स्वरूप अपनी पत्नी मीनाक्षी स्वरूप को टिकट दिलाने में सफल रहे। मीनाक्षी ने नामांकन किया तो पूरा परिवार उनके साथ आ खड़ा हुआ।

2022 विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर लड़ने वाले गौरव के छोटे भाई सौरभ स्वरूप और उनसे छोटे भाई विकास स्वरुप समेत उनके तहेरे भाईयों आशुतोष स्वरुप, शंकर स्वरुप, अजय स्वरुप अज्जू ने भी जिले के प्रभारी मंत्री सोमेंद्र तोमर के समक्ष भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। उनके साथ परिवार के अन्य सदस्यों ने भी भाजपा में ही आस्था जताई। इस तरह 56 साल से सियासी मोर्चे पर भगवा ब्रिगेड से टक्कर लेता आ रहा स्वरूप परिवार पूरी तरह से भगवा हो गया।

स्वरूप परिवार ने 33 साल बाद पालिका की राजनीति में पदार्पण किया है। 2000  में हुए नगर पालिका चुनाव में स्वर्गीय चितरंजन स्वरूप ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था, लेकिन वह भाजपा के जगदीश भाटिया से बेहद नजदीकी अंतर से केवल 826 वोट से चुनाव हार गए थे। उससे पहले 1990 में भी चितरंजन स्वरुप,लक्ष्मी चंद सिंघल के सामने चेयरमैन का चुनाव लड़े थे तब भी उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा था।

अब उनकी बहू मीनाक्षी स्वरूप के भाग्य ने जोर मारा तो स्वरूप परिवार ने दो बार चेयरमैनी में मिली पराजय को जीत में बदलने का काम किया है। 2000  में ‘गुडिया’ के जोर ने सपा प्रत्याशी चितरंजन स्वरूप को हराया था तो इस चुनाव में पतंग की मजबूती ने स्वरूप परिवार को चेयरमैनी की सीट दिलाने का काम किया है। अपनी पत्नी और भाजपा को जीत दिलाने में भाजपा नेता और उद्यमी गौरव स्वरूप चाणक्य साबित हो गये हैं।

गौरव स्वरूप ने इस चुनाव में अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर ऐसा सियासी चक्रव्यूह रचा कि सपा रालोद गठबंधन की प्रत्याशी लवली शर्मा और उनके पति राकेश शर्मा उसमें फंसकर निकल नहीं पाये। गौरव स्वरूप ने अपनी पत्नी भाजपा प्रत्याशी मीनाक्षी स्वरूप को जीत दिलाने के लिए सियासी बिसात पर ऐसी चाल चली कि गठबंधन के सभी हाथी-घोड़े चित्त होकर रह गये।

यहां पर पहले से ही माना जा रहा था कि भाजपा की जीत बसपा के हाथी और औवेसी की पतंग की मजबूती पर निर्भर करेगी। पतंग के निशान पर मुस्लिमों में बंटवारे की उम्मीद तो थी, लेकिन औवेसी की पार्टी की प्रत्याशी ‘छोटी’ इतनी बड़ी निकलेंगी , यह आभास किसी को नहीं था। मुख्य तौर पर छोटी को पतंग से चुनाव लड़ाना ही मुख्य रणनीति का हिस्सा रहा और रही सही कसर बसपा प्रत्याशी रोशन जहां ने पूरी कर दी। इन दोनों की रणनीति में गौरव स्वरूप दमदार साबित हुए और नतीजा जीत के रूप में निकला।

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