मुज़फ्फरनगर के निवासी सोनू उर्फ रोहित कश्यप की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद मेरठ के ज्वालागढ़ गांव में हुए हंगामे को लेकर पुलिस ने सख्त रुख अपनाया है। सरधना पुलिस ने निषेधाज्ञा (धारा 163) के उल्लंघन, पुलिस के साथ धक्का-मुक्की और भीड़ जमा करने के आरोप में मृतक के रिश्तेदारों और विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं समेत करीब 60 लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की है।

सरधना थाने में तैनात उप-निरीक्षक नितिन सारस्वत की ओर से दर्ज मुकदमे के अनुसार, बीते मंगलवार को सूचना मिली थी कि ज्वालागढ़ गांव में मदनमती के घर पर भारी भीड़ जमा है। आरोप है कि मृतक के रिश्तेदार इंद्रपाल, उसके बेटे अंकित, गुड्डू और 50-60 अज्ञात लोग वहां एकत्र होकर नारेबाजी और भाषणबाजी कर रहे थे। पुलिस का कहना है कि जिले में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए लागू निषेधाज्ञा का इन लोगों ने उल्लंघन किया और समझाने पर पुलिस के साथ धक्का-मुक्की व अभद्रता की, जिससे अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि मुख्य आरोपी बनाया गया इंद्रपाल ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है, जिसके चलते इस भीड़ और हंगामे के पीछे चुनावी रंजिश और राजनीतिक लाभ की मंशा भी देखी जा रही है। मौके पर बिगड़ती स्थिति को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करना पड़ा था।

पुलिस की कहानी में पेच: कब लागू हुई धारा 163?

इस पूरे मामले में मेरठ पुलिस की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। पुलिस ने मुकदमे में 13 जनवरी (मंगलवार) की घटना के समय धारा 163 (निषेधाज्ञा) लागू होने का दावा किया है। हालांकि, रिकॉर्ड के अनुसार एसडीएम उदित नारायण सेंगर ने कपसाड़ और ज्वालागढ़ में यह निर्देश बुधवार रात को जारी किए थे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जो आदेश बुधवार को जारी हुआ, उसके उल्लंघन में मंगलवार को मुकदमा कैसे दर्ज कर लिया गया?

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