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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सात साल से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद ऐसे मामलों में गिरफ्तारी करना यह दर्शाता है कि पुलिस के मन में देश के कानून के प्रति सम्मान की कमी है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने सचिन आर्य व अन्य की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान की। मामला प्रयागराज के धूमनगंज थाना क्षेत्र का है, जहां याची को आयुध अधिनियम से जुड़े एक मामले में पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया अवैध 
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि आरोपित धाराओं में न्यूनतम सजा दो वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष है। ऐसे में पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया अवैध प्रतीत होती है, क्योंकि पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत नोटिस जारी किए बिना ही गिरफ्तारी की कार्रवाई की थी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एस.के. अंतिल बनाम सीबीआई मामले का हवाला देते हुए कहा कि सात वर्ष से कम सजा वाले अपराधों में बीएनएसएस की धारा 35(3) का पालन किए बिना गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

रिहाई में देरी पर जताई नाराजगी
अदालत ने पाया कि 12 फरवरी को ही अवैध हिरासत मानते हुए याची की तत्काल रिहाई का आदेश दे दिया गया था। इसके बावजूद पुलिस ने आदेश के करीब 20 घंटे बाद उसे रिहा किया। कोर्ट ने इसे गंभीर अवमानना मानते हुए संबंधित थाना प्रभारी और उपनिरीक्षक के आचरण को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताया।

माफी की अर्जी खारिज, कार्रवाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने दोषी अधिकारियों की बिना शर्त माफी की अर्जी भी खारिज कर दी और प्रयागराज के पुलिस आयुक्त को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। हालांकि अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में मुआवजा देने से इनकार किया, लेकिन याची को मुआवजे के लिए अन्य कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है।

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