भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार की सुबह जोरदार गिरावट देखने को मिली। प्रमुख बेंचमार्क इंडेक्स भारी दबाव में रहे, जिसकी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और रुपये की कमजोरी को माना जा रहा है।

शुरुआती कारोबार में BSE Sensex करीब 855.79 अंक गिरकर 76,640.57 पर पहुंच गया, जबकि Nifty 50 भी 276.30 अंक टूटकर 23,946.45 के स्तर पर आ गया। बाजार में यह गिरावट व्यापक रही और लगभग सभी सेक्टर लाल निशान में कारोबार करते नजर आए।

विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेजी है, जो अब 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने, चालू खाता घाटा बढ़ने और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव जैसी चिंताएं गहरा गई हैं।

इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FII selling भी लगातार बाजार पर दबाव बना रही है। पिछले कारोबारी सत्र में विदेशी निवेशकों ने करीब 2,468 करोड़ रुपये की बिकवाली की, जबकि घरेलू निवेशकों (DII buying) ने 2,262 करोड़ रुपये की खरीदारी कर कुछ सहारा देने की कोशिश की, लेकिन कुल मिलाकर बाजार का सेंटीमेंट कमजोर बना हुआ है।

दूसरी ओर, भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 95 के स्तर से नीचे चला गया है और लगभग 95.02 पर खुला है। कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाता है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ जाता है और इसका सीधा असर शेयर बाजार पर पड़ता है।

कुल मिलाकर, crude oil price surge, FII outflow, और weak rupee impact ने मिलकर निवेशकों की धारणा को कमजोर किया है, जिसके चलते बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिल रही है।

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यह चुनाव केवल इस बात तक सीमित नहीं रह गया है कि राज्य सचिवालय नबान्न तक कौन पहुंचेगा, बल्कि यह इस बात पर जनमत संग्रह बन गया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 15 वर्षों के शासन के बाद भी बंगाल की केंद्रीय राजनीतिक शक्ति बनी रहती हैं या नहीं, और क्या लगातार चौथी जीत उन्हें 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत विपक्षी चेहरा स्थापित कर सकती है, या फिर भाजपा को राज्य में सत्ता का रास्ता मिल गया। दो चरणों में हुए विधानसभा चुनाव में कुल मतदान 92.47 प्रतिशत दर्ज किया गया। पहले चरण में 93.13 प्रतिशत और दूसरे में 91.66 प्रतिशत मतदान हुआ। यह स्वतंत्रता के बाद का अब तक का सर्वाधिक मतदान है। इसने 2011 के 84 प्रतिशत मतदान के रिकॉर्ड को भी पार कर लिया, जब बनर्जी पहली बार सत्ता में आई थीं और 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन का अंत हुआ था। बनर्जी के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की निर्णायक लड़ाई माना जा रहा है। लगातार तीन कार्यकाल और डेढ़ दशक तक सत्ता में रहने के बाद वह न केवल सत्ता बरकरार रखने बल्कि अपने स्थापित राजनीतिक ढांचे की रक्षा के लिए भी संघर्ष कर रही हैं। तृणमूल कांग्रेस और बनर्जी के बीच अंतर लगभग समाप्त हो चुका है। 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने आक्रामक अभियान चलाया था, तब बनर्जी ने चोटिल होने के बावजूद व्हीलचेयर पर रहकर मुकाबला किया और जीतीं, जिससे उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत विपक्षी नेता के रूप में बढ़ा। 2026 की लड़ाई अधिक कठिन मानी जा रही है। इस बार उन्हें सत्ता विरोधी लहर, भ्रष्टाचार के आरोप, भर्ती घोटालों और शासन संबंधी सवालों का सामना करना पड़ रहा है। तृणमूल के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा, “यह चुनाव बंगाल की राजनीतिक पहचान की रक्षा को लेकर है। यदि दीदी फिर जीतती हैं, तो यह साबित होगा कि कल्याणकारी राजनीति और बंगाली अस्मिता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हरा सकती है।” दूसरी ओर, भाजपा के लिए बंगाल अब भी अधूरा राजनीतिक लक्ष्य बना हुआ है। पार्टी का मानना है कि वह राज्य में सत्ता हासिल कर अपने “अंतिम वैचारिक मोर्चे” को पार कर सकती है। पार्टी का वोट शेयर 2011 में लगभग चार प्रतिशत से बढ़कर 2019 में करीब 40 प्रतिशत तक पहुंचा और 2021 में उसने 77 सीटें जीतीं, जिससे वह तृणमूल की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गई। एक भाजपा नेता ने कहा, “हमारे लिए बंगाल अधूरा राजनीतिक मिशन है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर आज तक यह एक राजनीतिक यात्रा को पूरा करने का प्रश्न है।” चुनाव में सबसे बड़ा विवाद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर रहा। राज्यभर में लगभग 91 लाख नाम हटाए जाने से करीब 12 प्रतिशत मतदाता सूची से बाहर हो गए। तृणमूल ने इसे अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, महिलाओं और गरीबों के मताधिकार को प्रभावित करने वाला कदम बताया, जबकि भाजपा ने इसे फर्जी नामों को हटाने की प्रक्रिया बताया। विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर ने चुनाव के गणित के साथ-साथ मनोविज्ञान को भी प्रभावित किया है। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा कि चुनाव केवल संख्याओं से नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न मनोवैज्ञानिक प्रभाव से तय होते हैं। मतगणना चार मई को होगी, जब यह स्पष्ट हो जाएगा कि बनर्जी का लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक वर्चस्व बरकरार रहता है या भाजपा अंततः राज्य में सत्ता तक पहुंचने में सफल होती है।

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