पश्चिम बंगाल में SIR विवाद को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है. सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में देरी करने पर जमकर फटकार लगाई है. अदालत ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि राज्य सरकार बार-बार अस्पष्ट और बेमतलब के बहाने बनाकर प्रक्रिया को लटकाने की कोशिश कर रही है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा कि हर दिन नए बहाने बनाना अब बंद होना चाहिए. गौरतलब है कि इस काम में तेजी लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड और ओडिशा से न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया है. कोर्ट ने साफ किया कि वह अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित कर रहा है कि चुनाव आयोग का काम समय पर पूरा हो.

कपिल सिब्बल की दलीलों को किया खारिज

बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के अधिकारी न्यायिक अधिकारियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है. सिब्बल का तर्क था कि कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इसके तौर-तरीके तय करने थे. इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने दो टूक शब्दों में पूछा कि अगर चुनाव आयोग के अधिकारी ट्रेनिंग नहीं देंगे, तो फिर और कौन देगा. कोर्ट ने कहा कि हमारा आदेश एकदम साफ है और न्यायिक अधिकारियों को यह अतिरिक्त जिम्मेदारी प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए दी गई है. अदालत ने सिब्बल की इन दलीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया.

मुख्य सचिव को मिलकर काम करने का निर्देश

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने राज्य की मुख्य सचिव की उपस्थिति का हवाला देते हुए कुछ व्यक्तिगत शिकायतें भी रखीं. इस पर पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि मुख्य सचिव को चुनाव आयोग और न्यायिक अधिकारियों के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि पुनरीक्षण का काम जल्द से जल्द पूरा हो सके. जस्टिस बागची ने कहा कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग दोनों की जिम्मेदारी है कि वे न्यायिक अधिकारियों के लिए काम करने का सही माहौल बनाएं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि

पूरक मतदाता सूची और कोर्ट का अंतिम रुख

सिब्बल ने यह मांग भी उठाई कि 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची आने के बाद, न्यायिक अधिकारियों के फैसलों के आधार पर एक पूरक सूची भी जारी की जानी चाहिए. इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि पूरी प्रक्रिया पहले से ही अदालत के आदेशों के तहत तय की गई है. कोर्ट ने दोहराया कि किन दस्तावेजों को स्वीकार करना है, यह पहले ही बताया जा चुका है और पूरी कार्रवाई नियमों के अनुसार ही होगी. अदालत के इस सख्त रुख से साफ है कि वह मतदाता सूची के काम में किसी भी तरह की देरी या राजनीति को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है.

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