राज्यसभा ने मंगलवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) विधेयक 2023 को ध्वनि मत से मंजूरी दे दी। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इसे प्रस्तुत किया था और इस पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि अगस्त 2023 में यह विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया था और मूल कानून में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान नहीं था।
मेघवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस संबंध में एक कानून बनाने का निर्देश दिया था जिसके आधार पर यह विधेयक लाया गया है। विपक्ष की आपत्तियों को खारिज करते हुए मेघवाल ने कहा कि निर्वाचन आयोग निष्पक्ष है और इस संशेधन विधेयक के बाद भी निष्पक्ष ही रहेगा। उन्होंने कहा, ‘‘इसके लिए सरकार भी प्रतिबद्ध है। यह विधेयक प्रगतिशील है।”
मेघवाल ने कहा कि यह सरकारी संशोधन विधेयक है। उन्होंने कहा कि इसमें ‘सर्च कमेटी’ एवं चयन समिति का प्रावधान है। इसमें वेतन को लेकर भी एक प्रावधान है। मेघवाल ने कहा कि इसमें एक प्रावधान है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त यदि कोई कार्रवाई करते हैं तो उन्हें अदालती कार्रवाई से छूट दी गई है।
इससे पहले विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति के लिए लाये गये विधेयक के कई प्रावधानों का तीखा विरोध करते हुए आशंका जताई कि इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने दावा किया कि इसके पीछे सरकार की मंशा निर्वाचन आयोग को ‘जेबी चुनाव आयोग’ बनाकर इसे अपनी मनमर्जी से चलाने की है।
विधेयक पर उच्च सदन में चर्चा शुरू करते लेते हुए कांग्रेस सदस्य रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि ‘‘निष्पक्षता, निर्भीकता, स्वयात्तता और शुचिता” चुनाव के आधारस्तंभ होते हैं। उन्होंने दावा कि यह प्रस्तावित कानून इन चारों को ‘बुलडोजर’ से कुचल देने वाला है। उन्होंने कहा कि सरकार इस विधेयक के जरिये चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप का प्रयास कर रही है। उन्होंने संविधान निर्माता डॉ बी आर आंबेडकर के एक वक्तव्य का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया कार्यपालिका के हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त रहनी चाहिए।
सुरजेवाला ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति जो समिति करेगी, उसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता एवं प्रधानमंत्री द्वारा तय किया गया कोई केंद्रीय मंत्री होगा। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय कह चुका है कि यदि निर्वाचन आयुक्त निष्पक्ष चुनाव नहीं करा पता तो वह कानून के शासन के आधार को ही खत्म कर देगा। कांग्रेस सदस्य ने कहा कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14 के विरूद्ध है और सरकार निष्पक्ष और स्वतंत्र मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्त नहीं चाहती तथा वह एक ‘जेबी चुनाव आयुक्त’ चाहती है जिसे वह अपनी मर्जी से चला सके। उन्होंने दावा किया कि सरकार निर्वाचन आयुक्त पर कार्यपालिका का नियंत्रण बनाये रखना चाहती है।
सुरजेवाला ने कहा कि इस विधेयक के जरिये सरकार ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों के लिए 100 प्रतिशत आरक्षण कर दिया है। उन्होंने कहा कि विधेयक में प्रावधान है कि इस पद पर कोई नौकरशाह या पूर्व नौकरशाह ही नियुक्त किया जा सकता है। उन्होंने सवाल किया कि इस पद पर कोई कानूनविद् क्यों नियुक्त नहीं हो सकता? उन्होंने कहा कि इस विधेयक के जरिये मुख्य निर्वाचन आयुक्त से निर्वाचन आयोग के नियमन का अधिकार छीना जा सकता है। उन्होंने कहा कि एक समय ईसी का मतलब ‘इलेक्टोरल क्रेडिबिलिटी (चुनावी विश्वस्तनीयता)’ हुआ करता था जो अब ‘इलेक्शन कंप्रोमाइस (चुनावी समझौता)’ हो गया है।