उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों पाल समाज को लेकर हलचल तेज हो गई है. करीब 40-41प्रतिशत ओबीसी आबादी वाले प्रदेश में पाल समाज की हिस्सेदारी लगभग 3 प्रतिशत मानी जाती है. भले ही यह आंकड़ा बहुत बड़ा न दिखे, लेकिन कई जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में पाल समाज निर्णायक भूमिका में माना जाता है. यही वजह है कि प्रमुख राजनीतिक दल इस समुदाय को साधने में जुट गए हैं.
राजनीतिक विश्लेषक योगेश मिश्रा के मुताबिक, ओबीसी वोट बैंक में यादव (करीब 9-10%) और कुर्मी (4-5%) के बाद अन्य जातियों में पाल समाज का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में खासा असरदार है. ऐसे में 3 प्रतिशत का यह वर्ग करीबी मुकाबले वाली सीटों पर जीत-हार तय करने की क्षमता रखता है.
सपा में श्यामलाल पाल संभालेंगे पार्टी की कमान
समाजवादी पार्टी ने 2024 लोकसभा चुनाव से पहले संगठन में बदलाव कर पाल समाज को प्रतिनिधित्व दिया. उन्होंने श्यामलाल पाल को अध्यक्ष बनाया. पार्टी का दावा है कि इसका सकारात्मक असर कई सीटों पर देखने को मिला. हाल ही में सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा यह बयान कि पूजा पाल को बीजेपी ने अपने पक्ष में कर लिया है और उनके खिलाफ पाल समाज के नेता श्यामलाल पाल प्रचार करेंगे, इस बहस को और तेज कर गया है. सपा का संदेश साफ है, वह पाल समाज के संगठित समर्थन का दावा कर रही है.
वहीं बहुजन समाज पार्टी भी पाल समाज को अपना परंपरागत समर्थक बताती रही है. बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल का कहना है कि पार्टी ने समय-समय पर पाल समाज को नेतृत्व और राजनीतिक सम्मान दिया है. ऐसे में सपा और बसपा के बीच इस वर्ग को लेकर प्रतिस्पर्धा साफ दिखाई दे रही है.
ओबीसी समीकरण पर काम करती है बीजेपी
योगेश मिश्रा का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी की रणनीति थोड़ी अलग मानी जाती है. बीजेपी व्यापक ओबीसी समीकरण पर काम करती है और किसी एक जाति विशेष पर खुलकर दांव लगाने के बजाय संतुलित सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश करती है. हालांकि विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी पाल समाज को लेकर स्पष्ट नेतृत्व नहीं दे पाई है.
बीजेपी और सपा के बीच पाल समाज का मुकाबला
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावों में पाल समाज का मुकाबला मुख्य रूप से बीजेपी और सपा के बीच दिख रहा है. ऐसे में पाल समाज का झुकाव जिस ओर अधिक रहेगा, वह कई सीटों पर परिणाम को प्रभावित कर सकता है.
