क्या मौत वाकई एक पूर्णविराम है या फिर एक धुंधली शुरुआत? विज्ञान जगत में इस सवाल ने हमेशा हलचल मचाई है, लेकिन न्यूयॉर्क के एनवाईयू लैंगोन मेडिकल सेंटर के प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ. सैम पर्निया की हालिया रिसर्च ने दुनिया को हैरान कर दिया है। डॉ. पर्निया का दावा है कि जब डॉक्टर किसी व्यक्ति को ‘Medically Dead’ घोषित कर देते हैं, उस वक्त भी इंसान का दिमाग पूरी तरह शांत नहीं होता। असल में, शरीर के हथियार डालने के बाद भी चेतना का एक हिस्सा सक्रिय रहता है, जो आसपास की हलचलों को महसूस कर सकता है।

मौत के कमरे की वो ‘सटीक’ यादें
डेली मेल में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, डॉ. पर्निया और उनकी टीम ने अमेरिका और ब्रिटेन के 25 अस्पतालों में दिल का दौरा झेलने वाले 53 ऐसे मरीजों का अध्ययन किया, जिन्हें तकनीकी रूप से मृत मान लिया गया था, लेकिन बाद में उन्हें पुनर्जीवित (CPR के जरिए) किया गया। इन मरीजों ने जो आपबीती सुनाई, वह किसी हॉलीवुड फिल्म के सीन जैसी लगती है। कई मरीजों ने दावा किया कि वे अपने शरीर से बाहर निकलकर कमरे में हो रही घटनाओं को देख रहे थे। चौंकाने वाली बात यह है कि उन्होंने डॉक्टरों की बातचीत और वहां चल रही मेडिकल प्रक्रियाओं का बिल्कुल सटीक विवरण दिया, जो उनके ‘clinically dead’ होने के दौरान हुई थीं।

मष्तिष्क की लहरों ने तोड़े पुराने मिथक
अब तक चिकित्सा विज्ञान यह मानता था कि दिल की धड़कन रुकने और ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होने के लगभग 10 मिनट के भीतर दिमाग स्थायी रूप से डैमेज हो जाता है। हालांकि, डॉ. पर्निया की रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती दी है। जांच के दौरान पाया गया कि हृदय गति रुकने के 35 से 60 मिनट बाद तक भी मरीजों के दिमाग में गामा, डेल्टा और अल्फा जैसी मस्तिष्क तरंगें सक्रिय थीं। ये वही तरंगें हैं जो इंसान की गहरी सोच, याददाश्त और जागरूकता से जुड़ी होती हैं।

डॉ. सैम पर्निया के अनुसार, “मस्तिष्क हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा टिकाऊ है। मौत के बाद भी व्यक्ति को यह अहसास रहता है कि वह अपने शरीर से अलग हो चुका है, लेकिन वह पूरी तरह सचेत होता है और जानकारी जुटा रहा होता है।”

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Verified by MonsterInsights