मुजफ्फरनगर में बुधवार शाम मोहर्रम का चांद नजर आ गया। इसके साथ ही शहर और देहात क्षेत्र के इमामबारगाह में मजलिस और मातम का दौर शुरू हो गया। गुरुवार को इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने मोहर्रम की 1 तारीख है। 29 जुलाई को रोजा ए आशूरा मनाया जाएगा। बुधवार को चांद नजर आते ही मुस्लिम शिया समाज के लोग शोक में डूब गए।
अंजुमन दुआए जहरा के प्रवक्ता स्वर्गीय इंतजार हुसैन जैदी के बेटे मंजर अब्बास जैदी ने बताया कि सन 61 हिजरी (680 ईस्वी) में इराक के कर्बला में पैगंबर मोहम्मद मुस्तफा (स.) के नवासे इमाम हुसैन (अ.) को उनके 72 साथियों के साथ शहीद कर दिया गया था। मुहर्रम में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का गम मनाते हैं। गिरिया (रोना) करते हैं। क्योंकि इस महीने में पैगंबर के नवासे की शहादत हुई थी। इसीलिए इस महीने को गम का महीना कहा जाता है।
मुहर्रम में शिया मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत का जिक्र करते हैं। उनका गम मनाने के लिए मजलिसें (कथा) करते हैं। मजलिसों में इमाम हुसैन की शहादत बयान की जाती है। मजलिस में तकरीर (स्पीच) करने के लिए ईरान और इराक से भी आलिम (धर्म गुरु) आते हैं। जिस इंसानियत के पैगाम के लिए इमाम हुसैन ने शहादत दी थी। उसके बारे में लोगों को बताते है। अगले 10 दिन तक जिले में मजलिस और मातम का दौर चलेगा। शिया सोगवार इमाम और उनके परिवार वालों की शहादत का गम मनाएंगे।
गुरुवार से मोहर्रम के तहत मजलिस का सिलसिला शुरू हो जाएगा। मोहल्ला किदवई नगर जाहिद हाल पर पहली मजलिस सुबह 9:00 बजे होगी। जिसे मौलाना कुमैल असगर खिताब फरमाएंगे। अबू पुराने मौलाना गफ्फार हुसैन, गढ़ी गोरवान इमामबाड़ा यादगारे हुसैनी में मौलाना कौसर मजलिस को खिताब फरमाएंगे। जुलूस का सिलसिला 5 मोहर्रम यानी 24 जुलाई से शुरू होगा।
