बीते दिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्षी सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था जिसे खारिज कर दिया गया. विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दोनों सदनों में महाभियोग जैसा नोटिस दिया है, ये नोटिस 10 पेज की है. इस नोटिस में सात तरह की बातों का जिक्र किया गया है. जिसमें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के दौरान बिहार और बंगाल में वोटरों के नाम बड़े पैमाने पर हटाना, कुछ पॉलिटिकल पार्टियों के प्रति भेदभाव करने जैसी बाते हैं.
इस स्थिति में बंद हो जाएगा मामला
इस प्रस्ताव लाने की पहल तृणमूल कांग्रेस की तरफ से की गई थी हालांकि बाद में विपक्ष भी इसमें शामिल हो गया. इस नोटिस में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों के हस्ताक्षर हैं. नोटिस स्वीकृत होने की स्थिति में ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई जाएगी. इसके बाद कमेटी जांच करेगी ये जांच कब तक चलेगी इसकी कोई समय सीमा नहीं होती, जांच के बाद कमेटी रिपोर्ट देगी, जिसे दोनों सदनों में पेश किया जाएगा. कमेटी अपनी राय देगी कि क्या महाभियोग के लिए कोई मामला बनता है? अगर बनेगा तो ठीक नहीं तो मामला तुरंत बंद कर दिया जाएगा.
क्या होती है महाभियोग की प्रक्रिया?
चीफ इलेक्शन कमिश्नर (या दूसरे इलेक्शन कमिश्नर) को हटाने का प्रोसीजर जज के प्रोसीजर जैसा ही है. सुप्रीम कोर्ट के जज को उनके पद से हटाने के प्रावधान संविधान के आर्टिकल 124(4) में बताए गए हैं. आर्टिकल 124(4) कहता है कि किसी जज को सिर्फ दो वजहों से हटाया जा सकता है. इसमें साफ किया गया है कि जज को केवल दो आधार पर ही हटाया जा सकता है – दुर्व्यवहार और कार्य निष्पादन में अक्षमता. 124 (5) के मुताबिक संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत के द्वारा एक प्रस्ताव पारित करके राष्ट्रपति को किसी जज को हटाने की सिफारिश की जा सकती है.
