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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (18 मई, 2026) को अपने उस फैसले पर नाराजगी जताई है, जिसमें 2020 के दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था. कोर्ट ने नार्को-टेरर केस के आरोपी जम्मू कश्मीर के सैयद इफ्तेखार अंद्राबी को जमानत दी और खालिद और शरजील को जमानत नहीं दिए जाने पर असहमति जताई.

UAPA और NDPS एक्ट की धाराओं के तहत आरोपों का सामना कर रहे अंद्राबी को रिहा करते समय सुप्रीम कोर्ट ने बिना ट्रायल लंबे समय से जेल में रहने को आधार बनाया है. अंद्राबी को जून 2020 में गिरफ्तार किया गया था.सुप्रीम कोर्ट ने कहा यूएपीए के मामलों में भी ‘बेल नियम है और जेल अपवाद’ का सिद्धांत लागू होता है. जनवरी महीने में कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जबकि बाकी सभी आरोपियों को रिहा कर दिया गया था.

अपने फैसले में जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले दूसरी बेंच के फैसले पर असहमति जताई है. उन्होंने के. ए. नजीब फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि अंद्राबी को जिस न्यायिक सिद्धांत के तहत जमानत दी जा रही है, उसे 3 जजों की बेंच ने तय किया था. उमर खालिद के मामले में दो जजों की बेंच ने उस सिद्धांत का पालन नहीं किया.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘जमानत नियम है और कारावास अपवाद है. यह अनुच्छेद 21 और 22 से निकला एक संवैधानिक सिद्धांत है और निर्दोष होने की धारणा कानून के शासन द्वारा शासित किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है.’

बेंच ने कहा है कि के. ए. नजीब मामले में उसका फैसला बाध्यकारी कानून है और अधीनस्थ अदालतें, हाईकोर्ट्स और यहां तक ​​कि सुप्रीम कोर्ट की अधीनस्थ बेंच भी इसे कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकती हैं. कोर्ट ने 2021 के के.ए. नजीब बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के ऐतिहासिक फैसले में यह तय किया था कि कठोर यूएपीए जैसे आतंकवाद-विरोधी कानूनों के तहत भी अगर मुकदमे में बहुत देरी हो रही है और आरोपी के निकट भविष्य में छूटने की संभावना नहीं है तो उसको जमानत दी जा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य फैसले में के.ए. नजीब फैसले का सही तरीके से पालन नहीं किया गया. कोर्ट ने 2024 के गुरविंदर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले पर भी असहमति जताई और कहा कि छोटी बेंच बड़ी बेंच के फैसलों को कमजोर नहीं कर सकती हैं. कोर्ट ने कहा कि गुलफिशा मामले में बेंच का यह कहना कि के.ए. नजीब का सिद्धांत सिर्फ असाधारण मामलों में लागू होगा, सही व्याख्या नहीं है.

जस्टिस उज्जल भुइंया ने फैसले में कहा, ‘कम सदस्यीय बेंच बड़ी बेंच की ओर से तय कानून से बंधी होती है. न्यायिक अनुशासन की मांग है कि बाध्यकारी मिसाल का पालन किया जाए और अगर कोई संदेह हो तो मामले को बड़ी बेंच को भेजा जाए. छोटी बेंच बड़ी बेंच के फैसले को दरिकनार, कमजोर या अनदेखा नहीं कर सकती है.’ कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘Watali’ फैसले का इस्तेमाल यूएपीए मामलों में अनिश्चितकाल प्री-ट्रायल हिरासत को सही ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने जनवरी में दिल्ली दंगों के आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को सशर्त जमानत दे दी थी, जबकि मामले के मुख्य आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं. दोनों सितंबर, 2020 से जेल में बंद हैं.

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