इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक विवाहित जोड़े के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करते हुए कहा है कि पुलिस अपनी इच्छा से विवाह करने वाले जोड़ों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर उनके पीछे भागकर भारी नुकसान कर रही है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने अन्य अपराधों की जांच करने के बजाय सहमति से विवाह करने वाले जोड़े के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और उसकी जांच करने की पुलिस की कार्रवाई की आलोचना की। अदालत ने ऐसे मामलों में उपचारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश पुलिस महानिदेशक को दिया।

अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को एक वयस्क को यह बताने का अधिकार नहीं है कि वह कहां जाएगा या जाएगी, किसके साथ जीवन गुजारेगा या गुजारेगी या किसके साथ विवाह करेगा या करेगी। यह संदेश देश के हर नागरिक को जाना चाहिए कि बालिग होने की उम्र का सम्मान किया जाना चाहिए। मौजूदा मामले में सहारनपुर में लड़की के पिता ने लड़के के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 87 (महिला का अपहरण, उसे विवाह के लिए विवश करना या अवैध यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित करना) के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी। हालांकि, लड़की ने उस लड़के के साथ अपनी इच्छा से विवाह किया था। अदालत ने इस मामले के तथ्यों और उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी विवाह प्रमाण पत्र का संज्ञान लेते हुए कहा कि गुमशुदगी की शिकायत पर पुलिस को प्राथमिकी दर्ज नहीं करनी चाहिए थी। लड़की ने अदालत को बताया कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है। इस पर अदालत ने उक्त प्राथमिकी को “याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में गंभीर अतिक्रमण” करार दिया।

इस तरह के मामलों में पुलिस की भूमिका पर आपत्ति जताते हुए अदालत ने कहा,”निःसंदेह, एक नाबालिग का मामला अलग होता है। लेकिन पुलिस वयस्क दंपत्ति के मामले में प्राथमिकी दर्ज कर और उनका पीछा कर भारी नुकसान कर रही है। पुलिस कभी-कभी उन्हें जबरदस्ती अलग करने और लड़की को उसके माता-पिता के पास भेजने की मंशा से काम करती है। ये कार्य बिल्कुल अवैध हैं और इनमें से कुछ अपराध हैं।” अदालत ने 21 अप्रैल को दिए अपने निर्णय में लड़की के पिता समेत प्रतिवादियों को याचिकाकर्ताओं के घर नहीं जाने और किसी भी तरीके से उनके शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में दखल नहीं देने का निर्देश दिया।

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