सुप्रीम कोर्ट के भीतर जूता फेंकने की हालिया घटना निंदनीय है, लेकिन उसके पीछे जो मनोभाव है, वह बढ़ते असंतोष की झलक भी देता है। इसी पृष्ठभूमि में पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने सलाह दी है कि “न्यायाधीश अदालत में कम बोलें”। जस्टिस काटजू ने कहा है कि “बहुत बोलने वाला न्यायाधीश बेसुरा बाजा होता है।” यह बात केवल तंज नहीं, बल्कि न्यायशास्त्र का वह मूलभूत सिद्धांत है, जिसे हम भूलते जा रहे हैं। जब अदालतों में वाक्पटुता न्याय से बड़ी हो जाती है, जब न्यायाधीश व्यंग्यात्मक टिप्पणी या ‘पब्लिक शो’ की मुद्रा में आने लगते हैं, तब अदालतों की गरिमा दरकने लगती है। काटजू का तर्क सीधा है— न्यायाधीश का काम बोलना नहीं, सुनना है।

देखा जाये तो अदालत वह जगह है जहाँ शब्द नहीं, तर्कों की मर्यादा तय होती है। लेकिन हाल के वर्षों में अदालतों का माहौल कुछ अलग दिशा में जाता दिख रहा है। जहां न्यायाधीश लगातार टिप्पणियाँ करते हैं, कभी समाज पर, कभी राजनीति पर, कभी याचिकाकर्ता पर। यह प्रवृत्ति न्याय की गंभीरता को न केवल हल्का करती है बल्कि उस न्यायिक तटस्थता को भी क्षीण करती है जिस पर इस संस्था की पूरी विश्वसनीयता टिकी है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए कहा है कि उन्हें कभी-कभी न्यायालय में भेदभावपूर्ण व्यवहार का अनुभव हुआ है। यदि एक वरिष्ठ वकील तक यह कहने को विवश हैं तो सोचिए सामान्य नागरिक की क्या अपेक्षा रह जायेगी? न्याय केवल किया नहीं जाना चाहिए, उसे दिखाई भी देना चाहिए— यह सिद्धांत जितना पुराना है, उतना ही आज भी प्रासंगिक है।

यह सच है कि उच्चतम न्यायालय में घटे घटनाक्रम पर प्रधान न्यायाधीश गवई ने उत्तेजना नहीं दिखाई, बल्कि दोषी अधिवक्ता को चेतावनी देकर छोड़ देने का निर्देश दिया, यह उनके न्यायिक संतुलन का प्रमाण है। लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या हमें ऐसी परिस्थितियाँ बनने से रोकना नहीं चाहिए? क्या अदालत को इतनी संवेदनशीलता नहीं रखनी चाहिए कि उसकी एक टिप्पणी भी समाज में विवाद का विषय न बने?

देखा जाये तो जस्टिस काटजू की यह नसीहत दरअसल अदालतों के चरित्र की पुनर्स्थापना की पुकार है। अदालतों का आदर्श वह होना चाहिए जहाँ गम्भीरता, शालीनता और संयम तीनों एक साथ झलकें। न्याय की ताकत उसकी भाषा की कोमलता में है, न कि तीखे व्यंग्य में। आज जब न्यायपालिका पर जनता की निगाह पहले से अधिक है, तब यह और भी ज़रूरी है कि न्यायाधीश अपने शब्दों की सीमा समझें। क्योंकि अदालत में बोला गया हर वाक्य आदेश से कम प्रभावशाली नहीं होता। काटजू की तल्ख बात का मर्म यही है कि न्याय की कुर्सी पर वाणी का नहीं, विवेक का शासन होना चाहिए।

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