जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में भारत के महान शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद ने अपनी उपस्थिति से दर्शकों को प्रेरित किया। उन्होंने न सिर्फ शतरंज की दुनिया से जुड़े अनुभव साझा किए, बल्कि जीवन, असफलता, धैर्य और मानसिक संतुलन पर भी गहरी बातें कही। आनंद ने कहा कि वे जयपुर कई बार आ चुके हैं, लेकिन JLF में उनका अनुभव हमेशा खास रहता है। उन्होंने बताया कि कैसे दशकों पहले का एक पुराना जुड़ाव उन्हें फिर से इस शहर से जोड़ता है। उनके अनुसार, एक लेखक या वक्ता के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है—संवेदनशील और जुड़ा हुआ श्रोता वर्ग।

 शतरंज और जीवन की समानता
अपने संबोधन में आनंद ने शतरंज और जीवन के बीच की समानताओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जैसे शतरंज में हर गलत चाल खेल खत्म नहीं कर देती, वैसे ही जीवन में भी हर गलती अंत नहीं होती। कुछ गलतियों से उबरा जा सकता है और कुछ से सीख मिलती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्णता की अपेक्षा रखना अव्यावहारिक है। इंसान को बेहतर बनने की कोशिश जरूर करनी चाहिए, भले ही वह 100% सफलता हासिल न कर पाए।

परिवार का महत्व
विश्वनाथन आनंद ने अपने माता-पिता और पत्नी की भूमिका को अपने करियर का अहम स्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि माता-पिता का विश्वास और समर्थन किसी भी युवा को मानसिक रूप से मुक्त करता है। उनकी पत्नी न सिर्फ उनकी जीवनसाथी रहीं, बल्कि मैनेजर और भावनात्मक सहारा भी बनीं।

धैर्य और मानसिक संतुलन
आनंद ने युवाओं को सलाह दी कि मुश्किल समय में धैर्य रखना बेहद जरूरी है। कभी-कभी समस्याओं से कुछ समय के लिए दूरी बनाना, पुराने दोस्तों से मिलना या मन को हल्का करना भी समाधान का हिस्सा होता है।

नई पीढ़ी के लिए संदेश
उन्होंने कहा कि आज की दुनिया उनके युवा दिनों से अलग है, लेकिन भावनाएँ, डर और संघर्ष आज भी वैसे ही हैं। अपने अनुभव साझा करने का उद्देश्य यही है कि युवा उन्हें अपने नजरिए से समझें और जो उपयोगी लगे, उसे अपनाएँ। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में विश्वनाथन आनंद की यह बातचीत न केवल शतरंज प्रेमियों के लिए, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक रही जो जीवन में आगे बढ़ना चाहता है।

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