आखिरकार, केंद्र सरकार ने बड़ा दांव चलते हुए चुनावी मौसम में मुफ्त अनाज की योजना पांच साल के लिए और बढ़ा दी। इसी नवम्बर में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का मतदान होना है और अगले साल मई में लोक सभा के चुनाव होने हैं।

इस दांव की काट किसी भी विपक्षी दल के पास नहीं है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 80 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है। यह अवधि फिलहाल 31 दिसम्बर, 2023 तक थी। इसके तहत उपभोक्ताओं को राशन की दुकान से प्रति माह प्रति व्यक्ति पांच किलो गेहूं या चावल और एक किलो दाल मुफ्त मिलते हैं।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत सभी गरीबों को मुफ्त अनाज योजना कोरोना महामारी के दौरान आरंभ हुई थी। गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे सामान्य परिवारों को प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज हर महीने निशुल्क दिया जाता है जबकि अंत्योदय वर्ग के उपभोक्ताओं को अनाज की यह मात्रा सात किलोग्राम प्रति व्यक्ति है। मसलन, प्रत्येक सामान्य परिवार को 25 किलो और अंत्योदय परिवार को 35 किलो अनाज हर महीने दिया जा रहा है।

कुल मिलाकर 81.35 करोड़ लोगों को रियायती दरों पर अनाज दिया जा रहा है। सरकार के भंडारों में अनाज की पर्याप्त उपलब्धता के चलते इस योजना की पूर्ति सुचारू रूप से चल रही है। सरकार के पास प्रत्येक वर्ष की पहली जनवरी को 138 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 76 लाख मीट्रिक टन चावल का भंडारण जरूरी होता है। यह भंडारण जरूरी आवश्यकता की तुलना में बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध है। केंद्रीय भंडार गृहों में 15 दिसम्बर, 2022 तक लगभग 180 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 111 मीट्रिक टन चावल मौजूद था। नतीजतन, सरकार का आत्मविास बढ़ा और उसने दृढ़ता के साथ गरीबों को मुफ्त में अनाज देने की योजना आरंभ कर दी और अब इसे आने वाले पांच सालों के लिए भी बढ़ा दिया गया है। इस योजना को चुनावी तुरु प का पत्ता माना जा रहा है।

हालांकि मोदी सरकार की यह बात थोड़ी विसंगतिपूर्ण लगती है कि जब करीब 13 करोड़ लोग गरीबी रेखा के ऊपर चले गए हैं, मसलन, आर्थिक रूप से सक्षम हो गए हैं, तो फिर इन्हें मुफ्त अनाज योजना से बाहर क्यों नहीं किया गया? राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून पूरे देश में लागू है। गरीबों अथवा भूखों को मिले सस्ते अनाज के अधिकार को इस कानून का उज्जवल पक्ष माना जाता है लेकिन इतनी बड़ी संख्या में देश के लोग भूखे हैं, तो यह चिंता का विषय है कि आजादी के अमृत महोत्सव में भी यह भूख क्यों बनी हुई है? अतएव संदेह होना लाजिमी है कि नीतियां कुछ ऐसी जरूर हैं, जो बड़ी संख्या में लोगों को रोटी के हक से वंचित बनाए रखने का काम कर रही हैं।

पूंजी और संसाधनों पर अधिकार आबादी के चंद लोगों की मुट्ठी में सिमटता जा रहा है। इस लिहाज से भूख की समस्या का यह हल सम्मानजनक और स्थायी नहीं  है। इस परिप्रेक्ष्य में अब देश के नीति-नियंताओं की कोशिशें होनी चाहिए कि लोग श्रम से आजीविका कमाने के उपायों से खुद जुड़ें और आगे भूख सूचकांक का जब भी नया सर्वेक्षण आए तो उसमें भूखों की संख्या घटती दिखे? खाद्य सुरक्षा के तहत करीब 67 फीसद आबादी मसलन, करीब 80 करोड़ लोगों को रियायती दर पर अनाज दिया जा रहा है। इसके दायरे में शहरों में रहने वाले 50 प्रतिशत और गांवों में रहने वाले 75 फीसद लोग हैं।

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