मुजफ्फरनगर। मानवता जब अपने सर्वोच्च स्वरूप में सामने आती है तो समाज उसे सलाम करता है। ऐसा ही भावुक और प्रेरणादायक दृश्य उस समय देखने को मिला जब लावारिसों की वारिस के नाम से पहचानी जाने वाली क्रांतिकारी शालू सैनी ने पहले एक लावारिस शव को अपना नाम देकर पूरे विधि-विधान से उसका अंतिम संस्कार कराया और उसी दिन वृद्धा आश्रम पहुंचकर अपनी बेटी का जन्मदिन बुजुर्ग माताओं के बीच बड़े स्नेह और सम्मान के साथ मनाया। एक ही दिन में दो अलग-अलग किरदार निभाकर उन्होंने समाज के सामने मानवता की अनूठी मिसाल पेश की।

 


जानकारी के अनुसार, पुलिस से सूचना मिलने पर क्रांतिकारी शालू सैनी तुरंत मौके पर पहुंचीं। मृतक की पहचान न होने और कोई परिजन सामने न आने पर उन्होंने उसे अपना भाई मानते हुए विधिवत अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी स्वयं उठाई। पूरे धार्मिक रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार कर उन्होंने यह संदेश दिया कि इस दुनिया से विदा होने वाले हर व्यक्ति को सम्मान मिलना चाहिए, चाहे वह लावारिस ही क्यों न हो। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करने के बाद शालू सैनी सीधे वृद्धा आश्रम पहुंचीं, जहां उन्होंने अपनी बेटी का जन्मदिन बुजुर्ग महिलाओं के साथ केक काटकर, फल वितरित कर और उपहार भेंट कर मनाया। बुजुर्ग माताओं ने भी बच्ची को आशीर्वाद देते हुए भावुक स्वर में कहा कि आज उन्हें ऐसा लगा मानो उनकी अपनी बेटी उनके बीच आई हो। आश्रम का माहौल खुशी और आत्मीयता से भर उठा। इस अवसर पर शालू सैनी ने कहा कि समाज में हर व्यक्ति को सम्मान और अपनापन मिलना चाहिए। एक ओर जहां लावारिसों को अंतिम विदाई देना उनका कर्तव्य है, वहीं बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान लाना उनका सौभाग्य। उन्होंने कहा कि बच्चों को भी सेवा और संस्कार की सीख घर से ही मिलनी चाहिए, इसलिए अपनी बेटी का जन्मदिन वृद्धा आश्रम में मनाने का निर्णय लिया गया। स्थानीय लोगों ने उनके इस कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की। कई सामाजिक संगठनों ने भी इसे मानवता की सच्ची सेवा बताते हुए कहा कि क्रांतिकारी शालू सैनी जैसे लोग ही समाज में संवेदनाओं को जीवित रखे हुए हैं। एक ही दिन में शोक और सेवा, करुणा और खुशी—दोनों भावों को संतुलित करते हुए उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्ची समाजसेवा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से होती है।
आज पूरा क्षेत्र उनके इस मानवीय कार्य की सराहना कर रहा है। सच ही कहा गया है—जहां संवेदना है, वहीं सच्ची क्रांति है, और क्रांतिकारी शालू सैनी इस क्रांति की सशक्त मिसाल बन चुकी हैं।

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