न्यायपालिका और संसद के बीच चल रहे एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद में आज सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकसभा स्पीकर द्वारा बनाई गई संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी। जस्टिस वर्मा ने समिति के गठन पर यह कहते हुए सवाल उठाया था कि उन्हें हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा के उपसभापति ने खारिज कर दिया था।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और एससी शर्मा की बेंच ने 8 जनवरी, 2026 को इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने अब इस चुनौती को खारिज कर दिया है, जिससे संसदीय समिति को आगे बढ़ने की इजाजत मिल गई है। अगस्त 2025 में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय पैनल की घोषणा की थी, जिनके घर से बड़ी मात्रा में कैश बरामद हुआ था, क्योंकि उन्हें हटाने की प्रक्रिया तेज हो गई थी। तीन सदस्यीय पैनल में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मनिंदर मोहन और सीनियर एडवोकेट बीवी आचार्य शामिल हैं।

क्या है मामला? (कैश विवाद की पृष्ठभूमि)

यह मामला अगस्त 2025 में तब शुरू हुआ जब जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर छापेमारी के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी (कैश) बरामद हुई थी। इस घटना के बाद उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे और उन्हें पद से हटाने (Impeachment) की प्रक्रिया तेज कर दी गई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इन आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय संसदीय पैनल का गठन किया था।

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