पश्चिम एशिया के उफनते समुद्री मोर्चे पर जब दुनिया की सांसें थम-सी गयी हैं, तब भारत की नौसेना ने अपने अदम्य साहस, रणनीतिक सूझबूझ और आक्रामक तैयारी से यह साफ कर दिया है कि अब हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर हमले और होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसकी पकड़ ने वैश्विक ऊर्जा संकट की आशंकाओं को भड़का दिया है। यह वही समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है और भारत के लिए तो यह जीवन रेखा है, क्योंकि उसकी अस्सी प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति इसी मार्ग से आती है।

ऐसे विस्फोटक हालात में भारतीय नौसेना का ऑपरेशन संकल्प केवल एक सैन्य तैनाती नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का खुला ऐलान बन चुका है। हम आपको बता दें कि खाड़ी क्षेत्र में तैनात भारतीय युद्धपोत लगातार निगरानी रखते हुए भारत की ओर आने वाले जहाजों को सुरक्षा कवच दे रहे हैं। आधुनिक मिसाइल विध्वंसक युद्धपोत आईएनएस सूरत को ओमान की खाड़ी में तैनात किया गया है, जो लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, टारपीडो और अत्याधुनिक हथियारों से लैस है। यह तैनाती केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि किसी भी खतरे को उसी के घर में जवाब देने की तैयारी का संकेत है।

 

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के पश्चिमी हिस्से में भारत से जुड़े 22 जहाज फंसे हुए हैं, जिन पर छह सौ ग्यारह नाविक सवार हैं। इसके अलावा चार जहाज पूर्वी हिस्से में भी अटके हैं। यह केवल व्यापारिक संकट नहीं, बल्कि सामरिक चुनौती है, और भारत ने इसका जवाब अपनी नौसैनिक शक्ति से दिया है।

 

इसी बीच अदन की खाड़ी में समुद्री लुटेरों के खिलाफ भारत का अभियान भी पूरी ताकत से जारी है। वहां तीन युद्धपोत तैनात हैं जो यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि स्वेज नहर और लाल सागर के रास्ते भारत आने वाला समुद्री व्यापार बाधित न हो। अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी, अंडमान निकोबार द्वीप समूह से लेकर मालदीव और सेशेल्स तक भारतीय नौसेना की उपस्थिति यह साबित कर रही है कि अब यह केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक समुद्री शक्ति बन चुकी है।

 

हाल ही में जिस तरह तीन भारतीय ध्वज वाले जहाजों ने होर्मुज के तनावपूर्ण माहौल को चीरते हुए सुरक्षित रास्ता तय किया, वह भारतीय नौसेना की ताकत और भरोसे का जिंदा उदाहरण है। शिवालिक नामक गैस वाहक जहाज चालीस हजार मीट्रिक टन द्रवित पेट्रोलियम गैस लेकर गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पहुंचा। जग लाडकी नामक जहाज अस्सी हजार टन कच्चा तेल लेकर सुरक्षित भारत की ओर बढ़ रहा है, जबकि नंदा देवी जहाज छियालिस हजार टन गैस लेकर वाडिनार पहुंच चुका है। यह केवल जहाजों की आवाजाही नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर किसी भी खतरे को नाकाम करने की निर्णायक क्षमता है।

 

लेकिन भारतीय नौसेना की असली ताकत केवल तैनाती में नहीं, बल्कि उसकी दूरदर्शी रणनीति और तकनीकी आत्मनिर्भरता में भी झलकती है। गुआम के पास आयोजित बहुराष्ट्रीय पनडुब्बी रोधी युद्ध अभ्यास सी-ड्रैगन में भारत की भागीदारी यह दिखाती है कि वह वैश्विक सैन्य मंच पर भी निर्णायक भूमिका निभा रहा है। ऑस्ट्रेलिया, जापान और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ मिलकर पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें ट्रैक करना केवल अभ्यास नहीं, बल्कि भविष्य के युद्धों की तैयारी है।

 

इससे भी आगे बढ़कर भारत ने कर्नाटक के कारवार में कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियों के रखरखाव के लिए एक अत्याधुनिक परीक्षण सुविधा स्थापित कर दी है। यह सुविधा पहले केवल फ्रांस और ब्राजील जैसे देशों के पास थी। अब भारत ने इसे अपने देश में विकसित कर लिया है। इसका मतलब साफ है कि अब भारत को अपनी पनडुब्बियों के रखरखाव के लिए विदेशी जमीन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। समय बचेगा, लागत घटेगी और युद्ध के लिए तत्परता कई गुना बढ़ेगी।

 

यह सब मिलाकर एक स्पष्ट तस्वीर उभरती है। भारतीय नौसेना अब केवल समुद्र की रखवाली करने वाली शक्ति नहीं रही, बल्कि वह भू राजनीति को प्रभावित करने वाली निर्णायक ताकत बन चुकी है। होर्मुज से लेकर हिंद महासागर तक भारत की मौजूदगी उन देशों के लिए चेतावनी है जो समुद्री रास्तों को हथियार बनाना चाहते हैं।

 

बहरहाल, आज जब दुनिया ऊर्जा संकट, समुद्री असुरक्षा और युद्ध की आशंकाओं से जूझ रही है, तब भारत ने यह दिखा दिया है कि वह केवल अपने हितों की रक्षा ही नहीं करेगा, बल्कि वैश्विक स्थिरता का भी मजबूत स्तंभ बनेगा। भारतीय नौसेना का यह उभार आने वाले समय में शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। और यह बदलाव केवल शुरूआत है।

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