भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमें काम करने की आज़ादी को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। जयशंकर ने याद दिलाया कि कैसे उस दौर में देश को भ्रष्टाचार और महंगाई जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा था।

छात्रों पर अत्याचार और विरोध की आवाज़

जयशंकर ने उस समय के हालात को बयां करते हुए कहा कि स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि छात्रों को उनके विश्वविद्यालयों से उठाकर सीधे जेलों में डाल दिया गया। उन्होंने उन लोगों की बहादुरी को सलाम किया जिन्होंने उस मुश्किल दौर में भी सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत दिखाई। यह दिखाता है कि कैसे विरोध की हर आवाज़ को दबाने की कोशिश की गई थी।

आपातकाल एक राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय मुद्दा

विदेश मंत्री ने आपातकाल को किसी भी राजनीतिक मुद्दे से ऊपर बताया। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि इसने लोगों के जीवन जीने के तरीके को गहराई से प्रभावित किया। जयशंकर के अनुसार, आपातकाल वह दौर था जब खुले तौर पर संविधान का मज़ाक उड़ाया गया और देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचला गया।

एक परिवार के कारण लगा आपातकाल, असर पूरे देश पर

एस. जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि देश में आपातकाल सिर्फ और सिर्फ एक परिवार की वजह से लगा था।  इसका भयानक असर पूरे देश और हर नागरिक पर पड़ा। यह बयान उस समय की सत्ताधारी पार्टी और उसके नेतृत्व पर सीधा हमला है, जो दर्शाता है कि कैसे कुछ व्यक्तियों के फैसलों ने पूरे देश को अंधेरे में धकेल दिया था। यह एक महत्वपूर्ण सबक है कि सत्ता का दुरुपयोग किस तरह देश की आत्मा को चोट पहुंचा सकता है।

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