भारत के लोकतांत्रिक-राजनीतिक-सामाजिक जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं होती हैं, या ऐसे दृश्य सामने आते हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि यहां कानून का शासन अभी तक ठीक से लागू नहीं हो पाया है। अगर सच में ऐसा है तो कह सकते हैं कि देश में लोकतंत्र अपनी जड़ें जमा नहीं पाया है।

भारत ही नहीं, एशिया-अफ्रीका के प्राय: सभी विकासशील देशों का हाल एक जैसा है। माना जाता है कि कानून का राज लोकतंत्र की सबसे अनिवार्य शतरे में से एक है। अगर किसी लोकतांत्रिक देश की प्रशासनिक मशीनरी कानून के राज को विफल करने का प्रयास करती है, तो लोगों का लोकतंत्र से विास डगमगाने लगता है।

मध्य प्रदेश के जनजातीय मंत्री विजय शाह का मामला इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी के बार में जिस तरह की अमर्यादित और भद्दी टिप्पणी की उससे पूरा देश स्तब्ध है और आक्रोश में भी है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने विजय शाह की टिप्पणी पर स्वत: संज्ञान लेते हुए उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया लेकिन पुलिस प्रशासन ने मंत्री महोदय को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि मंत्री शाह की जगह कोई आम आदमी होता तो पुलिस उसका क्या हाल बनाती। उनकी राजनीतिक पार्टी भाजपा भी इस मामले में खामोश है। 

पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता उनके बचाव में जो तर्क दे रहे हैं, वे भी कम हास्यास्पद नहीं हैं। कहा जा रहा है कि यह आपराधिक मामला है, इसलिए अदालत कार्रवाई करेगी यानी पार्टी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने मंत्री महोदय के माफी मांगे जाने को घड़ियाली आंसू या कानूनी कार्यवाही से बचने का प्रयास बता कर खारिज कर दिया और उनके खिलाफ मध्य प्रदेश पुलिस को स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया।

मंगलवार को टीम गठित भी हो गई है जो विजय शाह के बयानों की जांच करेगी। आजकल राजनीतिज्ञों में यह भी चलन आम हो गया है कि पहले विवादित बयान दो और जब उसकी आलोचना होने लगे तो माफी मांग लो या यह कह दो कि मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है या लगे हाथ अपने राजनीतिक विरोधियों द्वारा अपने खिलाफ रचाई गई साजिश बता कर अपने बयान से पल्ला झाड़ लो। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रुख से लगता है कि मंत्री विजय शाह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

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