पीएम मोदी चीन में शंघाई शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेकर भारत लौट चुके हैं। एससीओ समिट से निकले संदेश और तस्वीरों को लेकर दुनिया भर में चर्चा हो रही है। सम्मेलन में जिस तरह से पीएम मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ नजर आए उसके अपने मायने हैं। जानकारों का मानना है कि भारत ने इस सम्मेलन के जरिये अमेरिका को संदेश दे दिया है। संदेश है कि हम ट्रंप के टैरिफ के सामने झुकने वाले नहीं हैं। खास बात है कि एससीओ सम्मेलन की तस्वीरों पर जिस तरह से अमेरिका की प्रतिक्रिया आई है वह ट्रंप की बेचैनी को साफ दिखा रही है। अमेरिका की प्रतिक्रिया से साफ है कि वह भारत के हर कदम पर नजर रख रहा है।

ट्रंप को कैसे लग रही मिर्ची?

भारत की एससीओ में चीन और रूस से करीबी से ट्रंप को मिर्ची लग रही है। इस बात का अंदाजा ट्रंप की इस प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है। एससीओ सम्मेलन के खत्म होने के कुछ समय बाद ट्रंप ने भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड संबंधों की आलोचना करते हुए उसे एकतरफा बताया। ट्रंप का तर्क था कि भारत, अमेरिका को ‘भारी मात्रा में सामान’ निर्यात करता है, लेकिन अमेरिकी कंपनियों को अधिक टैरिफ बाधाओं का सामना करना पड़ता है। ट्रंप के अनुसार, भारत ने ऐतिहासिक रूप से ‘किसी भी देश की तुलना में सबसे अधिक’ टैरिफ लगाए हैं, जिससे उनके अनुसार ‘कई दशकों’ तक चलने वाला असंतुलित और अनुचित व्यापार संबंध बना है। उन्होंने दावा किया कि इस स्थिति ने अमेरिकी बिजनेस को नुकसान में डाल दिया है, जबकि अमेरिका भारत का ‘सबसे बड़ा ग्राहक’ बन गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने रूस से भारत की डिफेंस और तेल की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारत अपना अधिकांश तेल और डिफेंस साजोसामान रूस से खरीदता है, जबकि अमेरिका से बहुत कम खरीदता है। ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने अब अपने टैरिफ को पूरी तरह से कम करने की पेशकश की है, लेकिन अब देर हो रही है।

नोवारो की बेचैनी की वजह क्या है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने रूस के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों की आलोचना को दोहराया है। नवारो ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक को ‘शर्मनाक’ बताया। उन्होंने कहा, यह शर्मनाक है कि मोदी शी जिनपिंग और पुतिन के साथ मिल रहे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि वह क्या सोच रहे हैं। हमें उम्मीद है कि वह यह समझेंगे कि उन्हें रूस के साथ नहीं, बल्कि हमारे साथ रहना चाहिए।

तेल मुनाफे को ब्राह्मण से जोड़ने वाला बेतुका बयान

अमेरिका ने रूस से तेल आयात करने को लेकर भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ जुर्माने के रूप में लगाया है। इसके बावजूद भारत ने तेल आयात करना बंद नहीं किया है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने तेल मुनाफे के ब्राह्मण कनेक्शन वाला बयान देकर अपनी फजीहत करा ली है। पीटर नवारो ने कहा कि ‘ब्राह्मण’ भारतीय जनता की कीमत पर मुनाफाखोरी कर रहे हैं और इसे ‘रोकने’ की जरूरत है। नवारो ने पहले यूक्रेन संघर्ष को ‘मोदी का युद्ध’ बताया था। साथ ही कहा था कि ‘शांति का रास्ता’ आंशिक रूप से ‘नई दिल्ली से होकर गुजरता है।

अमेरिका में हो रही ट्रंप नीति की आलोचना

खास बात है कि ट्रंप की नीति को लेकर अपने घर में ही आलोचना झेलनी पड़ रही है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ट्रंप को खरी-खोटी सुनाई है। उन्होंने कहा है कि भारत को रूस के साथ शीत युद्ध के संबंधों से दूर रखने और चीन के बारे में उसे सावधान करने के पश्चिमी देशों के दशकों के प्रयास डोनाल्ड ट्रंप की ‘विनाशकारी’ टैरिफ नीति के कारण विफल हो गए हैं। बोल्टन ने यह भी आरोप लगाया कि डोनाल्ड ट्रंप की रणनीतिक कूटनीति की कमी ने शी जिनपिंग को पूर्वी एशिया में स्थिति को नया रूप देने का मौका दिया है।

परिवार के लिए अमेरिकी हित दांव पर?

पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे जेक सुलिवन ने भी ट्रंप को उनकी रणनीति के लिए आड़े हाथों लिया है। पूर्व एनएसए ने सुलिवन ने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के साथ अपने परिवार के व्यापारिक सौदों के लिए भारत के साथ संबंधों की बलि दे दी है। उन्होंने कहा कि हितों के स्पष्ट टकराव में, ट्रंप परिवार पाकिस्तान में एक क्रिप्टो वेंचर में शामिल है। अमेरिकी राष्ट्रपति पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर की चापलूसी कर रहे हैं। सुलिवन ने कहा कि अमेरिका को भारत के साथ तकनीक, प्रतिभा और आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देना चाहिए था।

इससे पहले भी सुलिवन ने ट्रंप पर हमलावर होते हुए उनकी नीतियों को विनाशकारी बताया था। सुलिवन ने कहा था कि ट्रंप ने भारत के खिलाफ ‘व्यापक व्यापार आक्रमण’ लागू कर नई दिल्ली को चीन की ओर धकेल रहे हैं। उनका कहना था कि जब मैं अब इन जगहों पर जाता हूँ और नेताओं से बात करता हूं, तो वे अमेरिका से जोखिम कम करने की बात करते हैं। वे अब अमेरिका को एक बड़े विघटनकारी देश के रूप में देखते हैं, एक ऐसे देश के रूप में जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सुलिवन ने साफ कहा था कि जहां चीन वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार खिलाड़ी की तरह दिख रहा है, वहीं ‘अमेरिकी ब्रांड टॉयलेट में है।

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