दिल्ली के लाल किले के पास हुए आत्मघाती कार धमाके के एक दिन बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने आतंक से जुड़े मामलों पर कड़ा रुख दिखाया है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम – UAPA के तहत गिरफ्तार एक आरोपी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान माहौल तनावपूर्ण
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने कोर्ट से कहा, “कल हुई घटना के बाद आज इस याचिका पर बहस करना शायद सही समय नहीं है।” इस पर अदालत की दो-न्यायाधीशों की पीठ — जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता — ने सख्त लहजे में जवाब दिया, “यही सबसे सही वक्त है एक स्पष्ट संदेश देने का।”

ISIS जैसे प्रतीक और डिजिटल सबूतों पर अदालत की टिप्पणी
जांच में यह सामने आया था कि आरोपी एक व्हाट्सऐप ग्रुप का सदस्य था, जिसमें ऐसा झंडा इस्तेमाल किया जाता था जो इस्लामिक स्टेट (ISIS) के झंडे से मिलता-जुलता था। अदालत ने यह दलील खारिज कर दी कि आरोपी के पास से सिर्फ धार्मिक किताबें मिली थीं। न्यायपीठ ने कहा कि बरामद सामग्री की प्रकृति और डिजिटल नेटवर्क से जुड़ाव गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं, जिनकी जांच पूरी होने तक आरोपी को रिहा नहीं किया जा सकता।

दिल्ली धमाके की गूंज अदालत तक
इस फैसले की टाइमिंग ने इसे और भी अहम बना दिया है — क्योंकि यह फैसला लाल किले मेट्रो स्टेशन के पास हुए आत्मघाती कार धमाके के अगले ही दिन आया। उस धमाके में कम से कम 10 लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए थे। अदालत के इस बयान को सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक कड़ा संदेश माना जा रहा है कि देश में आतंक या उग्रवाद से जुड़ी गतिविधियों पर किसी तरह की नरमी नहीं बरती जाएगी।

जांच जारी, अदालत का सख्त संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि UAPA जैसे कड़े कानूनों का मकसद केवल दंड नहीं, बल्कि समाज की सुरक्षा और भयमुक्त वातावरण सुनिश्चित करना है। अदालत का यह निर्णय उस वक्त आया है जब जांच एजेंसियां दिल्ली धमाके की साजिश, मॉड्यूल और संभावित कनेक्शन की तहकीकात में जुटी हैं।

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