ईरान पर अमेरिका और इजराइल की बमबारी के बीच अमेरिकी सरजमीं पर बसे ईरानी मूल के लोगों के दिलों में उम्मीद और डर साथ-साथ है। कई दिनों से टीवी स्क्रीन से नजरें न हटाने वाले इस प्रवासी समुदाय को उम्मीद है कि इससे उनके वतन का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है लेकिन इस बात का डर भी है कि उनके रिश्तेदार पश्चिम एशिया में एक नए युद्ध की मार झेलेंगे, जिसका कोई निश्चित अंत नहीं दिखायी दे रहा। शुरुआती हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर आई। अमेरिका में कुछ लोगों ने इसे जश्न की तरह मनाया। कहीं शैम्पेन की बोतलें खुलीं, कहीं सड़कों पर लोग इकट्ठा हुए। इंडियाना की 33 वर्षीय इंजीनियर एवा फरहादी कहती हैं, ”हम खुश हैं कि अब वह (खामेनेई) हमारे निर्दोष लोगों को नहीं मार सकेगा।”

 

जनवरी में उनके परिवार ने ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था, जिन पर दमन की कड़ी कार्रवाई हुई। उनके करीबी कई लोग सुरक्षा बलों की गोलीबारी में मारे गए। लॉस एंजिलिस में रेस्त्रां मालिक रूजबेह फराहानीपुर, जिन्हें 1999 के छात्र आंदोलनों के बाद जेल और यातना झेलनी पड़ी थी, ने भी खबर सुनकर जश्न मनाया, लेकिन तुरंत ही कहा, ”अब आगे क्या होगा?” लगातार जारी बमबारी में अमेरिकी सैनिकों और ईरानी नागरिकों की मौत की खबरें उन्हें व्यथित कर रही हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिलिस के अनुसार अमेरिका में चार से छह लाख के बीच ईरानी मूल के लोग रहते हैं, जिनमें अधिकांश कैलिफोर्निया में हैं। पास ही में तोचल मार्केट के 47 वर्षीय मालिक टॉड खुदादादी ने कहा कि वह और उनका परिवार ईरान में रहते थे और वे दो दशक से भी अधिक समय पहले अमेरिका आ गए थे।

 

उन्होंने कहा, ”ईरान में लोग नरक जैसी जिंदगी जी रहे हैं। हम लोकतंत्र चाहते हैं, दशकों तक एक व्यक्ति का शासन नहीं।” ईरान में रह रहे प्रियजनों से संपर्क करना कई लोगों के लिए मुश्किल हो गया है। फोन और इंटरनेट कनेक्शन भरोसेमंद नहीं हैं। पहले से प्रतिबंधों के कारण भोजन और दवाओं की कमी झेल रहे लोगों पर युद्ध का बोझ और बढ़ सकता है। मानवाधिकार कार्यकर्ता रोया बोरोमंड चेतावनी देती हैं, ”आप केवल बमबारी से किसी सत्तावादी शासन से छुटकारा नहीं पा सकते।” उनके अनुसार स्थायी बदलाव के लिए राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ढांचे में व्यापक सुधार जरूरी हैं। न्यूयॉर्क के ग्रेट नेक स्थित एक फारसी रेस्त्रां में हमलों के समर्थन में जश्न मनाया गया। वहीं, 1979 में परिवार सहित ईरान छोड़कर आयीं 63 वर्षीय मनोविश्लेषक गीता जरनेगर ने कहा, ”यदि मेरा देश 47 साल की गुलामी से मुक्त होता है, तो मैं सुरक्षित माहौल होते ही ईरान जाऊंगी।”

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