पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर चुनाव आयोग के विशेष गहन मतदाता सूची समीक्षा पर अपनी आपत्ति जताई है. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सिर्फ बंगाल को निशाना बना रहा है और यहां के लोगों के साथ अन्याय कर रहा है. ममता ने सवाल उठाया कि आठ अन्य राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया जारी है, फिर सिर्फ बंगाल में 8,100 माइक्रो-ऑब्जर्वर्स क्यों तैनात किए गए हैं.

भाजपा के हैं माइक्रो-ऑब्जर्वर्स?
ममता ने कोर्ट में कहा कि चुनाव आयोग बंगाल में विधानसभा चुनावों के ठीक पहले यह कार्रवाई कर रहा है. उनका सवाल था कि असम में भी चुनाव होने वाले हैं, वहां एसआईआर क्यों नहीं की जा रही. ममता ने यह भी कहा कि अधिकांश माइक्रो-ऑब्जर्वर्स भाजपा शासित राज्यों के सरकारी कर्मचारी हैं और इन्हें मतदाता सूची के संशोधन के लिए नियत किया गया है. उन्होंने पहले भी मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर इस प्रक्रिया की विधि पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर्स का मकसद बंगाल में डेटा को गलत तरीके से प्रभावित करना है.

8,100 माइक्रो-ऑब्जर्वर्स का काम क्या है?
चुनाव आयोग ने अब तक यह साफ नहीं किया है कि बंगाल में तैनात 8,100 माइक्रो-ऑब्जर्वर्स को किस काम के लिए भेजा गया है. हालांकि, बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी ने निर्देश जारी किए थे कि माइक्रो-ऑब्जर्वर्स को मतदाताओं द्वारा भरे गए फॉर्म की जांच करनी है, जमा किए गए दस्तावेजों को देखना है और उन मतदाताओं की सुनवाई को अवलोकन करना है जिन्हें उनकी पात्रता स्थापित करने के लिए नोटिस भेजा गया है.

चुनाव आयोग ने अपनी पत्र में बताया कि उन्हें संविधान के अनुच्छेद 324 (6) और मतदाता सूची मैनुअल 2023 के पैरा 11.4.7 के तहत अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार है. यह अधिकार आयोग को यह तय करने देता है कि चुनाव या मतदाता सूची संशोधन में आवश्यक अधिकारी नियुक्त किए जाएं. ममता ने आरोप लगाया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने ईआरओ या ओईआरओ के लॉग-इन पर कंट्रोल ले लिया और डेटा को संशोधित किया, जबकि रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1951 के तहत यह अधिकार  ईआरओ या ओईआरओ का है.

पर्याप्त नहीं हैं एसडीएम रैंक के अधिकारी 
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब देते हुए कहा कि बंगाल में माइक्रो-ऑब्जर्वर्स तैनात करना इसलिए जरूरी हुआ क्योंकि राज्य सरकार ने पर्याप्त संख्या में एसडीएम रैंक के अधिकारी ईआरओ के रूप में उपलब्ध नहीं कराए. आयोग ने कहा कि मैनुअल के अनुसार सामान्य तौर पर ईआरएम एसडीएम या एसडीओ रैंक के अधिकारी होते हैं, लेकिन अगर पर्याप्त संख्या में अधिकारी नहीं हैं तो तहसीलदार या समकक्ष रैंक के अधिकारी नियुक्त किए जा सकते हैं.

इतिहास में देखें तो माइक्रो-ऑब्जर्वर्स पहले केवल मतदान के दिन तैनात किए जाते थे, न कि मतदाता सूची संशोधन में. पूर्व सीईसी ओ.पी रावत ने भी पुष्टि की कि पहले कभी मतदाता सूची संशोधन के लिए माइक्रो-ऑब्जर्वर्स नहीं लगाए गए थे. आयोग के मैनुअल में केवल चुनाव पर्यवेक्षक और ईआरओ के कर्तव्य का विवरण है. मतदाता सूची पर्यवेक्षक डीईओ और ईआरओ की मदद करते हैं, समय पर सुधार सुनिश्चित करते हैं और प्रक्रिया की प्रगति की रिपोर्ट आयोग को देते हैं.

मतदाता सूची में हो रहा है बदलाव 
बंगाल में तैनात माइक्रो-ऑब्जर्वर्स में केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों और बैंकों के कर्मचारी शामिल हैं. टीएमसी का आरोप है कि इनकी भूमिका स्थानीय ईआरओ या ओईआरओ की जगह ले रही है और मतदाता सूची में जो भी बदलाव हो रहे हैं, उनमें इन्हें नियंत्रण हासिल है. ममता ने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया राज्य के अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए खतरा है.

सारांश में, बंगाल में 8,100 माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की नियुक्ति को लेकर विवाद है. ममता बनर्जी इसे चुनाव आयोग की सियासी पैठ और बंगाल पर असमान कार्रवाई मान रही हैं, जबकि आयोग ने इसे अधिकारियों की कमी और प्रक्रिया की निगरानी के लिए जरूरी बताया है. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गरमा-गर्म बहस का केंद्र बन गया है.

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